हल्दी की खेती

हल्दी की खेती ( turmeric planting ) भारत की एक महत्वपूर्ण मसाले वाली फसल है| हल्दी की खेती आँध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल एवं कर्नाटक में अधिक की जाती है|

हल्दी की खेती, Turmeric planting,   turmeric for hair growth

जिसका मुख्य उपयोग मसाले के रूप में किया जाता है| परन्तु यह रंग और औषधि के रूप में भी प्रयोग में लायी जाती है| मसाले के रूप में हल्दी खाद्य पदार्थों का स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ उनको अपने रंग से आकर्षक बनाती है|

रंग के रूप में हल्दी, ऊन, रेशंम व सूत को रंगने के काम में ली जाती है| आयुर्वेद मे हल्दी का उपयोग कई प्रकार की दवाओं को बनाने में करते हैं| हल्दी का भारतीय जीवन में इतना महत्व रहा है कि धार्मिक उत्सवों व पूजा-पाठ आदि कार्यक्रमों में एक पवित्र वस्तु के रूप में उपयोग होता है|

हल्दी की गुणवत्ता का आधार इसमें पाये जाने वाले रंगीन पदार्थ “क्युरक्यूमिन” (2.6 से 9.3 प्रतिशत) व वाष्पशील तेल (3.5 प्रतिशत) की मात्रा है|

सफल खेती के लिए उन्नत शस्य क्रियाओं को ध्यान में रखना जरूरी है| इस लेख में कृषकों के लिए हल्दी की उन्नत खेती turmeric planting कैसे करें की जानकारी का उल्लेख किया गया है|

हल्दी की जैविक उन्नत खेती turmeric planting की जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- हल्दी की जैविक खेती कैसे करें, जानिए किस्में, देखभाल और पैदावार

विषय सूची:-

turmeric planting

हल्दी की फसल turmeric planting के लिए गर्म एवं आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है| हल्दी को हल्की छाया में भी सफलतापूर्वक उगा सकते हैं|

जिन क्षेत्रों मे औसत वार्षिक वर्षा 225 से 250 सेंटीमीटर तक होती है, वहां पर हल्दी की फसल को बिना सिंचाई के सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है|

इसकी खेती समुद्र तल से 1200 से 1500 मीटर उँचाई तक की जा सकती है| फसल परिपक्वता अवधि में शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है|

Turmeric Planting भूमि का चुनाव

हल्दी की खेती turmeric planting सभी प्रकार की मिट्टी में कि जा सकती हैं, परंतु जल निकास अच्छा होना चाहिए| इसकी खेती के लिए पीएच 5 से 7.5 होना चाहिए|

इसके के लिए दोमट, जलोढ़, मिट्टी, जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो, वह इसके लिए अति उत्तम है| पानी भरी मिट्टी इसके लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त होती है|

हल्दी की खेती( turmeric planting) की तैयारी

हल्दी की फसल के लिए पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करने के उपरान्त 2 से 3 जुताइयाँ कल्टी वेटर या देशी हल से करके पाटा लगाकर मिट्टी भुरभुरी कर लेना चाहिए|

जीवांश कार्बन का स्तर बनाये रखने के लिए अन्तिम जुताई के समय 30 से 35 टन भलीभाँति सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला देना चाहिए|

जीवांश कार्बन युक्त एवं भुरभुरी मिट्टी में गाँठों की संख्या एवं आकार दोनों में वृद्धि होती है|

उन्नत किस्में

हल्दी की फसल turmeric planting से अधिकतम उत्पादन लेने की लिए किसानों को अपने क्षेत्र की प्रचलित और अधिक उपज वाली के साथ-साथ विकार रोधी उन्नत किस्म का चयन करना चाहिए|

हल्दी की उन किस्मों को अच्छा माना जाता है, जिनमें कुरकुमिन की मात्रा अधिक होती है| कुछ प्रचलित किस्में इस प्रकार है, जैसे- सुवर्णा, सुरोमा, सुगना, केसरी, रश्मि, रोमा, पालम पिताम्बर, पालम लालिमा, राजेन्द्र सोनिया और बी एस आर- 1 आदि प्रमुख है|

हल्दी की गाँठों के रंग और आकार के अनुसार अनेक किस्में पाई जाती हैं| मालावार की हल्दी औषधीय महत्त्व की होती है| जिसका उपयोग जुकाम के उपचार के लिए किया जाता है|

पूना एवं बंगलौर की हल्दी रंग के लिए अच्छी होती है| लौरवण्डी हल्दी से रंग निकाला जाता है| जंगली हल्दी सुगन्धित गाँठों के लिए प्रसिद्ध है|

अम्बा हल्दी कच्चे आम से मिलती-जुलती सुगंध देती है, परन्तु इसकी गाठे बड़ी पतली होती हैं| पकने की अवधि के आधार पर हल्दी की किस्मों को तीन वर्गों में बाटा जा सकता है, जिनका वर्णन निचे किया गया है|

IISR PRAGATI- एक उच्च उपज, लघु अवधि हल्दी विविधता।

विशेषता विशेषताएं:

  1. लघु अवधि की विविधता और कटाई के लिए केवल 180 दिन लगते हैं
  2. सिंचाई की गंभीर समस्याओं के साथ हल्दी उगाने वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है
  3. औसत उपज 38 टन / हेक्टेयर (ताजा राइजोम) के साथ उच्च उपज वाली किस्म है। उपज अनुकूल परिस्थितियों में 52 टी / हेक्टेयर तक जा सकती है। राष्ट्रीय और स्थानीय हल्दी किस्मों पर इसकी 30% और 34% उपज में वृद्धि हुई है।
  4. स्थानों पर स्थिर और उच्च कर्क्यूमिन किस्म (5.02%)
  5. रूट गाँठ निमेटोड संक्रमण के लिए मामूली प्रतिरोधी
  6. किस्म केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ राज्यों में खेती के लिए उपयुक्त है
  7. 2016 में NRC बीज मसालों (अजमेर, राजस्थान) में आयोजित XXVII अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना पर मसालों (AICRPS) समूह की बैठक के दौरान रिलीज़ के लिए इस विविधता की पहचान की गई थी।
    बेर कि खेती

उन्नतशील किस्में turmeric planting

नाममीन उपज (ताजा) टी / हेफसल अवधि (दिन)सूखी वसूली (%)करक्यूमिन
(%)
ओलेयोरसिन
(%)
आवश्यक
तेल (%)
सुवर्णा17.420020.04.313.57.0
सगुना29.319012.07.313.56.0
सुदर्शन28.819012.05.315.07.0
IISR प्रभा37.519519.56.515.06.5
IISR प्रतिभा39.118818.56.216.26.2
कोयम्बटूर -130.028519.53.26.73.2
कृष्णा9.224016.42.83.82.0
सुगंधम-15.021023.33.111.02.7
बीएसआर -130.728520.54.24.03.7
रोमा20.725031.09.313.24.2
सोरमा-20.025526.09.313.14.4
राजेंद्र सोनिया4.822518.08.45.0
रंगा29.025024.86.313.54.4
रश्मि31.324023.06.413.44.4

अल्प अवधि की किस्में- अल्प अवधि वाली किस्में करीब सात महीने में तैयार होती है| इनके प्रकंद पतले और अच्छी सुगंध देने वाले होते हैं|

इनमें वाष्पशील तेल की मात्रा अधिक होती है| परन्तु उपज और रंग में हल्की होती है| कस्तूरी, सुवर्णा, सुरोमा और सुगना आदि इस अवधि की किस्में हैं|

मध्यम अवधि वाली किस्में- मध्यम अवधि वाली किस्में लगभग आठ महीने की अवधि में तैयार होती हैं| इन्हें केसरी किस्में भी कहा जाता है|

इनकी उपज व गुणवत्ता अच्छी होती है| केसरी, रश्मि, रोमा आदि इस अवधि की किस्में हैं|

दीर्घ अवधि की किस्में- दीर्घ अवधि की किस्में नौ महीने से अधिक समय में तैयार होती है| उपज और गुणवत्ता के आधार पर यह सर्वोत्तम है|

इस अवधि में टेकोरपेट और माईडकुद आदि प्रमुख किस्में हैं|

हमारे देश के किसान अभी तक स्थानीय किस्मों से ही हल्दी की खेती कर रहे हैं| जिससे किसानों को अच्छी उपज प्राप्त नही होती है| य

दि हल्दी की खेती turmeric planting उन्नत किस्मों के साथ की जाये तो इसकी फसल से उच्च उपज प्राप्त की जा सकती है| हल्दी की किस्मों का चयन पीले रंग (ककुमिन) की मात्रा के आधार पर करना चाहिए|

हल्दी की उन किस्मों को अच्छा माना जाता है, जिनमें कुरकुमिन की मात्रा अधिक होती है| किसानों की जानकारी के लिए कुछ प्रचलित हल्दी की उन्नत किस्मों की विशेषताओं और पैदावार का वर्णन निचे किया गया है|

विशेषताएं और पैदावार turmeric planting

सोरमा-

यह हल्दी की किस्म 210 दिन में तैयार होती है| कंद के अन्दर का रंग नारंगी होता हैं| ताजे कन्दों की औसत उपज 80 से 90 क्विंटल प्रति एकड़ है|

सूखे कन्दों की औसत उपज 20 कुन्तल प्रति एकड़ होती है| इस किस्म में रोग कम लगते हैं| कन्दों में 9.3 प्रतिशत करक्युमिन एवं 4.4 प्रतिशत सुगन्ध तेल होता है|

सोनिया-

यह हल्दी की पर्ण धब्वा रोग रोधी किस्म है| ताजे कन्दों की औसत उपज 110 से 115 क्विंटल प्रति एकड़ है और सूखे कन्दों की औसत उपज 18 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ होती हैं|

फसल 230 दिन में पककर तैयार हो जाती है| कन्दों में 8.4 प्रतिशत कुरक्युमिन होता हैं|

हल्दी की खेती, Turmeric planting   turmeric for hair growth

सुगंधम-

हल्दी की किस्म के कन्द लाली लिये हुए पीले रंग के लम्बे होते हैं| यह 210 दिन में पककर तैयार हो जाती है| ताजे कन्दों की औसत उपज 80 से 90 क्विंटल प्रति एकड़ होती है|

सगुना-

किस्म के कन्द मोटे एवं गूदेयुक्त होते हैं| इस किस्म की अधिकतम उत्पादन क्षमता 240 से 250 क्विंटल प्रति एकड़ प्राप्त की जा सकती हैं|

लेकिन सामान्य परिस्थितियों में ताजे कन्दों की औसत उपज 110 से 120 क्विंटल प्रति एकड़ है| जिसमें से 25 से 30 क्विंटल प्रति एकड़ सूखे कन्द प्राप्त होते हैं|

इसमें 6 प्रतिशत सुगन्ध तेल प्राप्त होता है|

रोमा-

हल्दी की किस्म 255 दिन में तैयार हो जाती है| इस किस्म की अधिकतम उपज 160 से 170 क्विंटल कंद प्रति एकड़ प्राप्त की जा सकती है, पर औसतन लगभग 80 से 100 कुन्तल प्रति एकड़ ताजे कन्द व 26 क्विंटल प्रति एकड़ सूखे कन्द प्राप्त होते हैं|

पन्त पीतम्भ-

turmeric planting हल्दी की किस्म के कन्द चमकदार एवं आकर्षक होते हैं| बुवाई के 255 दिन बाद पककर तैयार हो जाती है, ताजे कन्दों की औसत उपज 100 क्विंटल प्रति एकड़ प्राप्त होती है|

बी एस आर 1-

यह एक्स किरण उत्परिवर्तन द्वारा तैयार किस्म है| यह जलाक्रांत खेत के लिये उपयुक्त है और इसका प्रकंद चमकीला नारंगी होता है|

4.2 प्रतिशत क्युरक्युमिन होता है तथा यह 285 दिन में परिपक्व होती है|

पालम पिताम्बर-

यह किस्म हरे पत्तों के साथ मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है| यह अधिक उपज देती है, जो औसतन उपज 332 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक प्राप्त हो सकती है|

किस्म में स्थानीय किस्मों से अधिक उपज देने की क्षमता है और इसकी गठियां उंगलियों की तरह लम्बी व रंग गहरा पीला होता है|

पालम लालिमा-

इसकी गठ्ठियों का रंग नारंगी होती है और स्थानीय किस्मों की अपेक्षा इसकी औसत वार्षिक उपज अधिक होती है|

किस्म की औसतन उपज 250 से 300 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक ली जा सकती है|

कोयम्बटूर-

यह हल्दी की बारानी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है| इसके कंद बड़े, चमकीले एवं नारंगी रंग के होते हैं| यह 285 दिन में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है|

कृष्णा-

यह हल्दी की लम्बे प्रकंदों तथा अधिक उपज देने वाली किस्म है| यह कंद गलन के प्रति रोगरोधी है और 255 दिन में पककर तैयार हो जाती है|

सुदर्शन-

इस हल्दी की किस्म के कन्द घने, छोटे आकार के तथा देखने में काफी खूबसूरत होते हैं| यह किस्म 190 दिन में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है|

राजेन्द्र सोनिया-

इस किस्म के पौधे छोटे यानि 60 से 80 सेंटीमीटर ऊँचे तथा 195 से 210 दिन में तैयार हो जाती है| इस किस्म की उपज क्षमता 400 से 450 क्विंटल प्रति हेक्टर तथा कुरक्युमिन 8 से 8.5 प्रतिशत है|

आर एच 5-

इस हल्दी की किस्म के पौधे भी छोटे यानि 80 से 100 सेंटीमीटर ऊँचे तथा 210 से 220 दिन में तैयार हो जाती है| इस किस्म की उपज क्षमता 500 से 550 क्विंटल प्रति हेक्टर तथा कुरक्युमिन 7.0 प्रतिशत है|

आर एच 9/90-

इस हल्दी की किस्म के पौधे मध्य ऊँचाई की यानि 110 से 120 सेंटीमीटर के होते है तथा यह किस्म 210 से 220 दिन में तैयार हो जाती है| इस किस्म की उपज क्षमता 500 से 550 क्विंटल प्रति हेक्टर है|

आर एच- 13/90-

पौधे मध्यम आकार यानि 110 से 120 सेंटीमीटर उंचाई लिए होते है| इसके तैयार होने में 200 से 210 दिन का समय लगता है| इस किस्म की उपज क्षमता 450 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टर है|

एन डी आर 18-

इस किस्म के पौधे मध्यम आकार यानि 115 से 120 सेंटीमीटर उंचाई लिए होते है तथा इसको तैयार होने में 215 से 225 दिन का समय लगता है| इसकी उपज क्षमता 350 से 375 क्विंटल प्रति हेक्टर है|

सी एल-

327 ठेकुरपेन्ट- इसके पंजे लम्बे, चिकने एवं चपटे होते हैं| इसकी अवधि 5 से 7 माह तथा उत्पादन क्षमता 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टर है और सूखने पर 21.8 प्रतिशत हल्दी प्राप्त होती हैं|

सी एल-

326 माइडुकुर- यह लीफ स्पाॅट बीमारी की अवरोधक प्रजाति है| लम्बे पंजे वाली, चिकनी, नौ माह में तैयार होती है| उत्पादन क्षमता 200 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा सूखने पर 19.3 प्रतिशत हल्दी मिलती हैं|

बुआई का समय

जलवायु, किस्म एवं बीजू सामग्री के अनुसार हल्दी की बुआई 15 अप्रैल से 15 जुलाई तक की जा सकती है|

अगेती किस्मों की बुआई 15 अप्रैल से 15 मई तक तथा मध्यम किस्मों की बुआई 15 अप्रैल से 30 जून तक और पछेती किस्मों की बुआई 15 जून से 15 जुलाई तक अवश्य कर देनी चाहिए|

बीज दर

प्रति ईकाई क्षेत्र आवश्यक बीज की मात्रा कन्दों के आकार पर निर्भर करती है| मुख्य रूप से स्वस्थ व रोगमुक्त मातृ कन्द एवं प्राथमिक प्रकन्दों को ही बीज के रूप में प्रयोग करना चाहिए|

बोआई के समय प्रत्येक प्रकन्दों में 2 से 3 सुविकसित आंख अवश्य होनी चाहिए| सामान्यत: कन्द के आकार व वजन के अनुसार 17 से 23 क्विंटल कंद प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यकता होती है|

कंदों का उपचार

हल्दी की बोआई के पूर्व कंदों को फंफूदीनाशक इंडोफिल एम- 45 की 2.5 ग्राम अथवा कारबेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर की दर से पानी में घोलकर उपचारित करते है| घोल में कन्दों को 60 मिनट डुबोकर रखने के बाद छाया में सुखाकर 24 घण्टे के बाद बुआई करते है|

turmeric planting विधि

हल्दी को तीन प्रकार से लगाया जा सकता है| समतल भूमि में, मेढ़ों पर और ऊँची उठी हुई क्यारियों में बलुई दोमट मिट्टी में हल्दी को समतल भूमि में लगा सकते हैं, लेकिन मध्यम व भारी भूमि में बीजाई सदैव मेढ़ों पर एवं उठी हुई क्यारियों में ही करनी चाहिए|

बीजाई सदैव पंक्तियों में करें, पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से 40 सेंटीमीटर एवं पंक्तियों में कंद से कंद की दूरी 20 से 25 सेंटीमीटर रखनी चाहिए|

बीजाई के लिए सदैव स्वस्थ एवं रोग रहित कंद छांटना चाहिए| कंद लगाते समय विशेष ध्यान रखने की बात है कि कंद की आँखें ऊपर की तरफ हों तथा कंद को 4 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर लगाकर मिट्टी से ढक देना चाहिए|

मल्चिंग या पलवार लगाना

फसल turmeric planting की बुआई के तुरन्त बाद पलवार या मल्चिंग लगाना लाभदायक होता है| पलवार के लिए 150 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से धान का पुआल या सरसों के डण्ठल उपयुक्त होते है|

पलवार से भूमि में नमी अधिक समय तक बनी रहती है, फसल में जमाव भी अच्छी तरह से होता है तथा खरपतवार भी रूक जाते हैं

पलवार में ली गयी सामग्री भूमि में मिला देने पर जीवांश की मात्रा भी बढ़ जाती है, जिससे उसकी उर्वराशक्ति भी बनी रहती है|

मिश्रित खेती

हल्दी की फसल turmeric planting के साथ मैदानी क्षेत्र में मिर्च एवं अन्य फसलों के साथ मुख्यतया सब्जी वाली फसलों में इसे मिश्रित फसल के रूप में लगाया जाता हैं|

इसे अरहर, सोयाबीन, मूंग, उड़द की फसल के साथ भी लगा सकते है| अन्तरवर्ती फसल के रूप में बगीचों में जैसे आम, कटहल, अमरूद, चीकू, केला फसल के लाभ का अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है|

खाद एवं उर्वरक

हल्दी में खाद एवं उर्वरक की मात्रा खेत की मिट्टी की जांच करवा कर दी जानी चाहिए| हल्दी की फसल अन्य फसलों की अपेक्षा भूमि से अधिक पोषक तत्वो को ग्रहण करती है|

अच्छी उपज में जीवांश कार्बन के महत्व को देखते हुए 30 से 35 टन प्रति हेक्टेयर गोबर या कम्पोस्ट की सड़ी हुई खाद अन्तिम जुताई के समय मिला देना चाहिए|

सायनिक खाद के रूप में प्रति हेक्टेयर 120 से 150 किलोग्राम नत्रजन 80 किलोग्राम फास्फोरस तथा 80 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है|

नत्रजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा पंक्ति के दोनों तरफ बीज (कंद) से 5 सेंटीमीटर दूर तथा 10 सेंटीमीटर गहराई में डालना चाहिए|

नत्रजन की शेष आधी मात्रा दो बार भाग में खड़ी फसल में प्रथम बार बोआई से 35 से 45 दिन एवं द्वितीय बार 75 से 90 दिन पर पंक्ति के बीच बुरकाव के रूप में डालना चाहिए|

नाइट्रोजन उर्वरक के बुरकाव के समय ध्यान रखें कि खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए|

सिंचाई एवं जल निकास

हल्दी की फसल को पर्याप्त सिंचाई की आवश्यकता होती है| मिट्टी की किस्म, जलवायु, भूमि की संरचना, वर्षा एवं पलवार के अनुसार 10 से 20 दिन के अन्तराल पर सिंचाई की जाती है|

प्रकन्दों के जमाव व वृद्धि-विकास के समय भूमि को नम रखना आवश्यक है| उचित जल निकास फसल के लिए आवश्यक है|

इसके लिए खेत के ढाल की दिशा में 50 सेंटीमीटर चौड़ी तथा 60 सेंटीमीटर गहरी खाई बना देना चाहिए, जिससे अवांछित जल खेत से बाहर निकल जाय|

वर्षा के समय खेत से जल निकास अत्यंत आवश्यक है|

खरपतवार नियन्त्रण

सामान्य अवस्था एवं फसल की सामान्य वृद्धि को बनाये रखने के लिए 2 बार निराई-गुडाई करके खरपतवारों का नियंत्रित कर पौध पर मिट्टी चढ़ा देते है|

रासायनिक विधि से नियंत्रिण करने के लिए फ्लुक्लोरालिन 1.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के छिड़काव से एक वर्षीय घास व चौड़ी पत्तियों वाले खरपतवारों का सफलतापूर्वक नियन्त्रण किया जा सकता है|

हल्दी की खेत में पत्तियों या पुआल की पलवार लगाने से काफी हद तक खरपतवार पर नियन्त्रण किया जा सकता है|

रोग एवं रोकथाम

पत्ती चित्ती-

बीमारी से ग्रसित पत्तियों के भीतरी व बाहरी दोनों ही पटलों पर ललाई युक्त भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं तथा पत्तियाँ शीघ्र पीली पड़ जाती हैं|

रोकथाम- यह रोग बोर्डो मिश्रण ओरियोफीन्जन (2.5 मिलीलीटर) जीनेब (0.1 प्रतिशत) या डाइथेन- जेड- 78 (0.2 से 0.3 प्रतिशत) के घोल के छिड़काव से नियन्त्रित किया जा सकता है|

पत्ती धब्बे-

इस बीमारी से ग्रसित पौधों की पत्तियों व कभी-कभी पर्ण पर भी धब्बे बन जाते हैं| इस रोग की उग्र अवस्था में सभी पत्तियाँ सूख जाती हैं और पूरी फसल जली हुई सी दिखाई देने लगती हैं|

रोकथाम- इस बीमारी के लक्षण दिखाई देने से पहले अगस्त माह में 1.0 प्रतिशत बोर्डो मिश्रण या 2 प्रतिशत केप्टान या डाइथेन जेड-78 (0.2 से 0.3 प्रतिशत) के छिड़काव से नियन्त्रण किया जा सकता है|

प्रकंद गलन-

यह रोग मिट्टी एवं प्रकंद जनित हैं| पत्तियों का सूखना पहले किनारों पर शुरू होता है, जो बाद में पूरी पत्ती को घेर लेता है, रोग बढ़कर प्रकंदो पर आक्रमण करता है, जिससे उनका रंग पहले चमकीला हल्के संतरे से बदलकर भूरा हो जाता है, तत्पश्चात् प्रकंद नरम होकर गलना शुरू हो जाता है|

रोकथाम- इस रोग का नियन्त्रण स्वस्थ प्रकंद एवं उपयुक्त कवकनाशी से उपचारित करते हैं और डाइथेन एम- 45 (0.2 प्रतिशत) का घोल बनाकर मिट्टी में डालते हैं|

कीट एवं रोकथाम

बालदार सूड़ी-

यह बहुभक्षीय कीट है, जो कि प्रारम्भिक अवस्था में समूह के रूप में पत्तियों को खाकर नुकसान पहुंचाते है| पूर्ण विकसित सुंडी पत्तियों को खाकर लालीनुमा आकृति शेष छोड़ देती है|

रोकथाम- प्रभावित पत्तियां तोड़कर नष्ट कर देते है और रासायनिक विधि से नियंत्रित करने के लिए एन्डोसल्फान 35 ई सी की 1.5 लीटर या मैलाथियान 50 ई सी की 2 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करते है|

उत्तक बेधक-

उत्तक बेधक तने को खाकर मृत केन्द्र बना देता है| इस तने के मरने पर जो दूसरे तने विकसित होते है| उनको भी यह कीट खा लेता है|

रोकथाम- जिन पौधों या तनों पर कीट का आक्रमण नजर आता है| उसको नष्ट कर देना चाहिए| प्रभावी नियंत्रण के लिए विशेषज्ञों की सलाह लेवें|

फसल खुदाई

अगेती फसल सात माह मध्यम आठ माह पछेती 9 से 10 माह में पक कर तैयार हो जाती है| फसल के पकने पर पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं तथा सूख जाती हैं|

इस समय धनकंद पूर्ण विकसित हो जाते हैं| धनकंद की खुदाई से 4 से 5 दिन पहले हल्की सिंचाई कर देते हैं, जिससे प्रकंद पुंजों को आसानी से खोद कर निकाला जा सके प्रकंद पुंजों को भूमि से निकालने से पूर्व ऊपर की पत्तियाँ काटकर अलग कर देते हैं|

तत्पश्चात् प्रकंद भूमि से कुदाली या फावड़ों की सहायता से आराम से निकाल लेते हैं, फिर प्रकंदों को अच्छी तरह से पानी से धो लेते हैं, तत्पश्चात् प्राथमिक (मातृ प्रकंद) व द्वितीयक (फिन्गर्स) प्रकंद अलग कर लेते हैं और विधिपूर्वक उबलने के उपरांत हल्दी बनाकर विपणन कर देना चाहिए|

पैदावार

उपरोक्त वैज्ञानिक विधि से हल्दी की खेती करने पर सिंचित क्षेत्रों में शुद्ध फसल से 300 से 550 क्विंटल और असिंचित क्षेत्रों में 100 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर कच्ची हल्दी प्राप्त हो जाती है| सुखाने के बाद कच्ची हल्दी की यह उपज 15 से 25 प्रतिशत तक होती है|

हल्दी की क्योरिंग:-

हल्दी के प्रकन्दों को सूखा लेना चाहिए तथा उसके ऊपर की गंदगी साफ करके कड़ाहे में उबलने के लिए डालंे।

फिर उसे कड़ाहे में चूने के पानी या सोडियम बाई कार्बनेट के पानी में घोल लें। पानी की मात्रा उतनी ही डालें जिससे पानी ढॅंक जावे।

उसे 45 से 60 मिनट तक उबाले जब सफेद झाग आने लगे तथा उसमें से जब विचित्र महक आने लगती है, तब उसे अलग से पृथक करें। आजकल सोलर ड्रायर भी हल्दी के लिए बनाये गये हैं।

उसे पानी से निकाल कर अलग करें। हल्दी जो कि उबल कर मुलायम हो गयी है या नहीं। खुदाई के 2 दिन बाद ही उबालना चाहिए। फिर उसे 10-15 दिन सुखाएं।

हल्दी का सुखाना:-

उबली हुई हल्दी को बांस की चटाई पर रोशनी में 5-7 से.मी. मोटी तह पर सुखायें। शाम को ढॅंककर रख दें। 10-15 दिन पूर्णतया सूख जाने से ड्रायर के 60 डिग्री से. पर सुखाते हैं। सूखने के बाद तक उत्पाद प्राप्त होता हैं।

पालिशिंग:-

हल्दी का बाहरी भाग खुरदरा तथा छिलके वाला दिखाई देता है। इसीलिए उसे चिकना तथा एक समान बनाने के लिए हाथ से आदमियों द्वारा पालिश करते है।

बोरियों में भरकर उसे रगड़ा जाता है। आजकल पालिशिंग ड्रम बनाये गये हैं, उसमें भी पालिश करते हैं।

हल्दी को रंगने के लिए 1 किलोग्राम हल्दी को पीस कर उससे एक क्विंटल हल्दी को रंगा जा सकता है, जिससे यह ऊपर से एक समान पीले रंग की दिखाई देती है।

हल्दी से बनने वाले उत्पाद:-

1.हल्दी का पाउडर जो मसाले के काम आता हैं।

  1. हल्दी का आयल:- हल्दी में 3 से 5 प्रतिशत बोलाटाइल आयल (तेल) निकलता हैं जो स्टीम डिस्टीलेशन द्वारा निकाला जाता हैं। यह हल्दी पाउडर से निकाला जाता हैं। तेल 8 से 10 घंटे में धीरे-धीेरे निकलता हैं।
  2. 3. टर्मकेरिक ओलियोरोजिन:- यह साल्वेन्टर एक्सट्रेक्शन विधि से निकाला जाता है। इसकी कीमत कर्कुमिन की मात्रा के ऊपर निर्भर करती हैं।

हल्दी का उपयोग:-

  1. भोजन में सुगन्ध एवं रंग लाने में, बटर, चीज, अचार आदि भोज्य पदार्थों में इसका उपयोग करते हैं। यह भूख बढ़ाने तथा उत्तम पाचक में सहायक होता हैं।
  2. यह रंगाई के काम में भी उपयोग होता हैं।
  3. दवाओं में भी उपयोग किया जाता हैं। (turmeric for hair growth)
  4. कास्मेटिक सामग्री बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता हैं।

turmeric for hair growth

एक बाल देखभाल आहार में हल्दी शामिल करना चाहिए और इसमें कोई शक नहीं कि आप समय की एक छोटी अवधि में लाभ देखेंगे ।

बालों की देखभाल के लिए हल्दी का उपयोग करने के कई लाभ हैं जैसे कि यह रूसी व्यवहार करता है, खोपड़ी से संबंधित मुद्दों जैसे एक्जिमा, जड़ से बालों की स्थिति आदि से छुटकारा पाने में मदद करता है

Tags

turmeric planting
turmeric for planting
 
turmeric for hair growth

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *