भारत का रोटावेटर ( rotavator )

रोटावेटर ( rotavator, rotovator ) ट्रैक्टर से चलने वाला एक छोटा सा मशीन है। किसान इसका उपयोग खेतों में बीजों की बुवाई से पहले जमीन की जुताई के लिए करते हैं। लोकप्रिय भारत का रोटावेटर के बारे में आज हम जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं।

अनाज के लिए अमेरिका रशिया आदि देशों पर निर्भर रहने वाला भारत अब कृषि उत्पाद मैं स्वयं पूर्ण हो गया है।

इतना ही नहीं बल्कि भारत से कृषि उत्पादन का बड़े पैमाने पर निर्यात भी होता है।

कृषि उत्पाद में वृद्धि के लिए तथा स्थिर विकास के लिए खेतों में मशीनरी ( Agricultural machinery ) का उपयोग बहुत जरूरी है।

यंत्रो ( Agricultural machinery ) के उपयोग से कृषि उत्पादन में होने वाली लागत में कमी पाई गई है।

भारत कृषि माल के उत्पादन में विश्व में दूसरे स्थान पर है। पिछले 70 सालों से हर साल भारत में कृषि उत्पाद में वृद्धि हुई है।

कृषि उत्पाद वृद्धि में संकरित बीज, रासायनिक खाद के साथ फार्म इक्विपमेंट ट्रैक्टर, रोटावेटर ( Bharat ka rotavator ) कल्टीवेटर की महत्वपूर्ण भूमिका हैं।

कल्टीवेटर का आधुनिक संस्करण ही रोटावेटर है। इसे रोटरी टिलेज rotary tillage के नाम से भी जाना जाता है।

रोटावेटर ( rotavator ) पहली बार किसानों के लिए अमेरिका में एक स्विस कंपनी ने 1930 में उपलब्ध कराया था।

इसकी उपयोगिता देखकर पूरे विश्व भर के किसानों ने इस फार्म इक्विपमेंट farm equipment को अपनाया हैं।

 

कुछ साल पहले  खेतों में बैल और आदि जानवरों का प्रयोग होता था। अब किसान भाई ट्रैक्टर चलित यंत्रों का उपयोग करते हैं।

कृषि उत्पाद के उत्पादन में जुताई tillage की अहम भूमिका होती है।

Tillage के लिए हल ( plough )और रोटावेटर ( Bharat ka rotovator ) का इस्तेमाल किया जाता है। बैल चलित और ट्रैक्टर चलित दोनों भी प्रकार के होते हैं।

रोटावेटर ( rotavator ) का उपयोग 

मुख्य रूप से जमीन की ऊपरी सतह को ढीला करना के उद्देश्य से किया जाता है। 

खेतों में हल चलाने के बाद मिट्टी के छोटे छोटे गड्ढे रह जाते हैं रोटावेटर से उनकी पिसाई करके जमीन बुवाई के लिए तैयार की जाती है।

खेतों में एक फसल की कटाई होने के बाद कुछ अवशेष बचे रहते हैं उन अवशेषों को  rotavator के मदद से जमीन में अच्छी तरह से गाड़ दिया जाता है।

खेत अगले फसल के लिए जल्दी से तैयार हो जाता है।

पिछले सीजन में जमीन कि जो नमी होती है उसका उपयोग अगले हंगाम के फसल को आसानी से किया जा सकता है।

जुताई से मिट्टी को उर्वरक के साथ अच्छी तरह से मिलाया जाता है। साथ में खेतों में उगी हुई खरपतवार को भी निकाला जाता है।

आज भारत में बहुत सी कंपनियां रोटावेटर ( rotavator ) की उत्पादन करती है।

लेकिन इनमें से कुछ कंपनियों के द्वारा बनाए गए रोटावेटर ( rotavator ) ही किसान भाइयों की पसंद पर खरे उतरे हैं।

कुछ लोकप्रिय रोटावेटर की लिस्ट नीचे की तरफ।

  1. जाधव फाल्क Jadhao Falk rotavator

  2. शक्तिमान रोटावेटर shaktiman rotavator

  3. सोनालिका  sonalika rotavator

  4. गोविंद  gobind rotavator

  5. फार्मर  Farmers rotavator

rotavator अनुदान ( agriculture subsidy )

 

भारत सरकार के कृषि विभाग द्वारा कृषि यांत्रिकीकरण उप अभियान (Sub-Mission on Agricultural Mechanization – SMAM ) इस मिशन के तहत कृषि क्षेत्र में यांत्रिकीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनुदान मुहैया कराया जाता है।

रोटावेटर के मॉडल अनुसार अनुदान किसानों को दिया जाता है।

अनुदान प्राप्त करने के लिए किसानों को राज्य सरकार के कृषि विभाग से संपर्क करना पड़ता है। 

रोटावेटर (rotavator) की प्रिसिजन फार्मिंग ( precision farming ) और अन्य सुरक्षा ( food security in India ) में अहम भूमिका है।

 

हमने किसानों की राय जानने की कोशिश की। अधिकांश किसान भाइयों ने जाधव फाल्क कंपनी द्वारा बनाया गया रोटावेटर प्राथमिकता दी।

जाधव फाल्क रोटावेटर इटली की फाल्क इंस्ट्रूमेंट और भारत की जाधव लेलैंड दोनों कंपनियों के संयुक्त तकनीक से बनाया गया है।

फाल्क मशीन एग्रिकोल 1960 से फार्म इक्विपमेंट ( Farm Equipment ) के उत्पाद में कार्यरत है।

कंपनी द्वारा बनाए गए एग्रीकल्चर इक्विपमेंट्स विश्व भर के 60 से अधिक देशों में एक्सपोर्ट किए जाते हैं।

जाधव लेलैंड 1986 स्थापित कंपनी है शुरुआती दिनों में कॉटन जिनिंग इंस्टॉलेशन कि काम करती थी।

बाद में एग्रीकल्चर इक्विपमेंट्स बनाना शुरू किया । फैक्ट्री महाराष्ट्र के अमरावती जिले में स्थित है।

rotavator के बारे में विकिपीडिया पार अधिक जानकारी पढे.

 

इटालियन टेक्नोलॉजी से बनाए गए इस भारत का रोटावेटर ( Bharat ka rotavator ) की कुछ विशेषताएं।

Bharat ka rotavator भारत का रोटावेटर rotovator

भारत का रोटावेटर invented rotavator rotovator

१) कम वाइब्रेशन रोटावेटर –

rotavator और ट्रैक्टर जोड़ने वाले शाफ्ट में विशेष तकनीक का उपयोग किया।

इस तकनीक के कारण ट्रैक्टर और रोटावेटर दोनों को कम वाइब्रेशन होता है।

[embedyt] https://www.youtube.com/watch?v=RtAflIp9PPA[/embedyt]

२) अधिकतम वजन-

आप वीडियो में देखें रोटावेटर पर रखा हुआ पानी का गिलास कम वाइब्रेशन के कारण नहीं गिर रहा।

6 फीट वाले 1 मॉडल का वजन 645 किलोग्राम है।

अधिक वजन होने के कारण ब्लेड आसानी से जमीन में घुसकर मिट्टी की अच्छी तरह से पिसाई और जुताई करते हैं।

३) जंग रोधक –

पेंटिंग मैं दो चरण वाली पेंटिंग तकनीक का उपयोग किया है। कोटिंग रोटावेटर को जंग रोधी बनाती हैं।

जंग रोधी तंत्रज्ञान (जंग रोधी तकनीक Anti-corrosion technology ) से रोटावेटर की आयु बढ़ने में मदद मिलती है।

४) ब्लेड की गुणवत्ता –

जाधव फाल्क रोटावेटर में उपयोग की जाने वाली ब्लेड इटालियन तकनीक से बनाए गए हैं।

उच्च तंत्रज्ञान से बनाई गई इस ब्लेड को रखरखाव में कम लागत होती है।

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सांप से बचने के उपाय ( Snake repellent In India )

Snake repellent

किसी भी चीज का रोकथाम करना इलाज करने से बेहतर होता है। सांप की जानकारी लेकर हम सांपों  से होने वाले सर्पदंश  संकट से बच सकते हैं। सांप से बचने के उपाय ( स्नेक रेपेलेंट, Snake repellent in India Hindi )  का अवलंब करके सर्पदंश से होने वाले जीवित हनी को टाला जा सकता है।

सांप की जानकारी


विश्वभर में सांपों की 2500 से 3000 प्रजातियां है। भारत में सांपो की लगभग 270 प्रजातियां पाई जाती है जिनमें से लगभग 50 प्रजातियां जहरीली है।


भारत में हर साल करीब 280000 सांप के काटने की घटनाएं घटती है।

विभिन्न संस्थाओं के आंकड़ों के आधार पर भारत में हर वर्ष लगभग 50,000 लोग सर्पदंश के कारण मृत होते हैं।


भारत में पाए जाने वाले जहरीले सांपों में इंडियन क्रेट, इंडियन कोबरा (King Cobra), रसैल वाईपर, सॉ स्केल्ड वाईपर, द किंग कोबरा, इंडियन पिटवाई पर आदि का समावेश है।


सांपो के बारे में समाज में बहुत सारी अंधश्रद्धा फैली हुई है। सांप की जानकारी लेकर हम सांप के बारे में फैलने वाली अंधश्रद्धा को कम कर सकते हैं।


  • १ सांप दूध पीते हैं साथ में स्थाना क्रांति का अभाव होता है। दूध को पचाने वाली पाचन कोशिकाएं नहीं पाई जाती।


  • २ सांप बीन धुन पर नाचते हैं सांपों के कान नहीं होते वह सिर्फ बिन को देखकर हिलते हैं।

     


इंडियन कोबरा (King Cobra) नाग भारत में पाए जाने वाले सभी सांपों में से सबसे जहरीला है।


नाग के काटने से इंसान को बचाना बहुत मुश्किल होता है।

सांप मनुष्य को बिना मतलब के काटते नहीं । उन्हें खतरा महसूस होने पर खुद के बचाव के लिए डसते हैं।


किसान भाइयों को सांप के काटने की मुश्किल का सामना करना पड़ता है।


खेत में काम करते वक्त सांप अनेक बार किसानों पर खुद के बचाव के लिए हमला कर देता है।


अनेक बार सांप घर के आस-पास ही पाए जाते हैं। अन्न की तलाश में वह गांव के आजू बाजू में ही रहते हैं।


सांप का भोजन चूहे, कीटक, विविध प्रकार के जीव जंतु आदि होता है। इन्हें की तलाश में सांप घर में पहुंच जाते हैं।


मनुष्य को हानि पहुंचाने वाले जीव जंतु, किटक सांप का भोजन होते हैं। इसीलिए कभी-कभी वह किसानों के लिए लाभकारी भी हो सकता है।


लेकिन कभी-कभी मनुष्य और पालतू जानवरों को दुश्मन समझ कर सांप उन पर हमला कर देता है।


सांप को मारना हमारे लिए भी हानिकारक है क्योंकि वह निसर्ग चक्र का एक घटक है। मानव को हानि पहुंचाने वाले चूहे आदि जीव जंतु सांप का भोजन होते हैं। snake repellent


अगर सांप ही नहीं रहेंगे तो चूहे जैसे इंसान को या किसानों को हानि पहुंचाने वाले जीव की संख्या बढ़ेगी। यह घर का तो नुकसान करते हैं साथ में खेतों में उगाई गई फसल भी खा जाते हैं।


हर एक जीव का स्वभाव होता है कि वह घृणास्पद जगह रहना नहीं चाहता या फिर वह जगह छोड़कर जाने snake repellent की भावना उसके मन में होती है।


सुरक्षित जगह पर रहना ही हर एक जो पसंद करता है। असुरक्षित जगह छोड़कर जाने प्रेरणा उसे स्वयं मिलती है।


 यही दोनों तत्वों के आधार पर snake repellent काम करता है। Repellent का मतलब होता है प्रतिकर्षित करने वाला । किसी भी जीव के मन में घृणा उत्पन्न करने का काम repellent करता है।

 

सर्पदंश से बचने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है कि सांप मनुष्य निवास के पास ना  snake repellent आए।


विविध प्रकार के उपायों से सांपों को मनुष्य बस्ती से दूर रखा जा Snake repellent सकता है।


सांप को मनुष्य बस्ती से दूर रखने वाले उपाय तथा उपकरणों को स्नेक रेपेलेंट Snake repellent कहा जाता है।


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सांप को दूर रखने के उपाय –

सांप को दूर रखने के तथा सांप से बचने के बहुत से उपाय है। उपायों से सांपों को घर से दूर रखा जा सकता है। सबको घर से दूर रखने,  खेतों से दूर रखने को , या उन्हें भगाने के तकनीक को स्नेक रेपेलेंट कहा जाता है।

स्नेक रेपेलेंट Snake repellent तीन प्रकार के होते हैं।

१) रासायनिक Snake repellent in India Hindi

बाजार में ग्रेन्यूल्स तथा लिक्विड में उपलब्ध होते हैं।

ज्यादातर स्नेक रेपेलेंट में नेप्थलीन पाया जाता है। कुछ स्नेक रेपेलेंट में कैस्टर, पेपरमेंट , आदि तीव्र बास आने वाली सामग्री मिलाई जाती है।


सांप सूंघने की शक्ति को बढ़ाकर फार्मूला काम करता है ताकि वह अपने शिकार को सूँघ न सके।

अति तीव्र बदबू के कारण वह जगह छोड़कर खुली हवा में जाता है। सांप को ज्यादा बांस आने वाली जगह पसंद नहीं होती ।

उन्हें वहां खतरा महसूस होता है। इसलिए वह जगह छोड़ कर चले (snake repellentजाते) हैं।

आप Snake repellent Amazon से खरीद सकते हैं।


अन्न सुरक्षा के प्रिसीजन फार्मिंग (precision farming in India)

फाल आर्मी वर्म – fall armyworm in India


२) आवाज Snake repellent in India Hindi


अल्ट्रासोनिक साउंड ultrasonic sound snake repellent के आधार पर बनाए गए बहुत से उपकरण बाजार में उपलब्ध है।


मनुष्य के श्रवण शक्ति से अल्ट्रासोनिक साउंड ultrasonic sound  की क्षमता अधिक होती है।


अल्ट्रासोनिक साउंड आवाज मनुष्य को सुनाई नहीं देती।


यह आवाज सुनने की क्षमता कुछ किटक,  सांप में होती हैं।


अल्ट्रासोनिक साउंड से सांप विचलित होते हैं और वह जगह छोड़ कर  चले जाते हैं। अल्ट्रासोनिक साउंड Snake repellent प्रोडक्ट Amazon से खरीद सकते हैं।


अल्ट्रासोनिक साउंड Snake repellent आप साथ में लेकर घूम सकते हैं। इसे आप खेत में लेकर जा सकते हैं।

जहां काम करना है वही इसे खड़ा कर दीजिए, स्विच ऑन कीजिए यह अपना काम शुरू करेगा।

सौर ऊर्जा पर काम करने वाले भी कुछ snake repellent बाजार में उपलब्ध है। इसे बैटरी या बैटरी रिचार्ज की जरूरत नहीं होती। यह सूरज की रोशनी पर ही काम करते हैं।

सांप को दूर रखने के उपाय

 

 


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खेती के प्रकार ( types of farming in India )

भारत एक कृषि प्रधान देश हैं। तथा भारत में खेती करने के अनेक तरीके है। हमारे देश में सभी क्षेत्रों में अलग-अलग खेती के प्रकार ( types of farming in India ) की खेती की जाती हैं।

भारत में लगभग 10000 साल से ज्यादा समय से खेती की जा रही है।

जमीन, पानी, जलवायु खेती का उपयोग किस के आधार पर इसके खेती के प्रकार  विकसित हुए हैं।

भारत में की जाने वाली सभी प्रकार की खेती के प्रकार ( types of farming in India ) जानने की आज हम कोशिश करेंगे।

आमतौर पर टेरेस कल्टीवेशन का हिंदी में मतलब होता है सोपान कृषि।

सोपान कृषि भारत में की जाने वाली खेती के प्रकार में से   हैं।

farming types in India Terrace cultivation
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इसके साथ पर्वत के उतार पर भी छोटे-छोटे टेरेस तैयार करके खेती की जाती है।

इस प्रकार की खेती मेघालया, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, और उत्तरांचल आदि राज्यों में की जाती है।

इस प्रकार की खेती ( types of farming in India ) का एक डिसएडवांटेज होता है कि वर्षा से मिलने वाले पानी का ड्रेनेज जल्दी से हो जाता हैं। इसकी वजह से पानी की खपत ज्यादा होती हैं।

इंटेंसिव फार्मिंग का हिंदी में मतलब गहन कृषि या फिर सघन कृषि ऐसा होता हैं।

खेती करने की इस प्रणाली में अधिक परिश्रम, धन, उर्वरक और किटकनाशक डालकर अधिक उत्पादन लिया जाता हैं।

एक ही जमीन पर 1 साल में कई फसलें बोई और उगाई जाती हैं।

मक्का और गन्ने की खेती में फ़र्टिलाइज़र, पेस्टिसाइड और ज्यादा मेन पावर इस्तेमाल की जाती है। एक प्रकार की इंटेंसिव फार्मिंग ( types of farming in India ) है।

farming types in India Intensive farming
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अन्न सुरक्षा के लिए इंटेंसिव फार्मिंग जरूरी है। सघन खेती में कम क्षेत्र से अधिक उत्पादन पाया जाता हैं।

 

सिंचाई बिना की जाने वाली खेती को ड्राई लैंड एग्रीकल्चर या फिर (शुष्क भूमि खेती) कृषि कहा जाता हैं।

जहां बहुत कम बारिश होती है वहां खेती करने की यह प्रणाली ( types of farming in India ) का इस्तेमाल किया जाता है।

 

farming types in India Dry agriculture
https://www.agric.wa.gov.au

 

ऐसी फैसिलिटी एक बार खेत में रोपण कर देने के बाद काफी लंबे समय तक उत्पादन देती है ऐसी फसलों की खेती को प्लांटेशन फार्मिंग (रोपण खेती) कह जाता हैं।

farming types in India Plantation agriculture खेती के प्रकार
Prezi.com

साधारण तौर पर वृक्षारोपण या फलों की खेती को रोपण खेती कहां जाता हैं।

पिस्ता, काजू, रबड़, कॉफ़ी, आम, अनार, कोकोनट, केला आदि फसलों का समावेश रोपण खेती में होता हैं।

रोपण खेती व्यापारी खेती का ही एक प्रकार है। जहां पर अधिक आय प्राप्त करने के हेतु से ही पेड़ों का रोपण किया जाता हैं।

जहां जंगल और भारी वर्षा होती है वहा शिफ्टिंग एग्रीकल्चर (स्थानांतरण खेती) की जाती हैं। किसान भाई पेड़ और झाड़ियों को काटकर मैदान साफ करते हैं।

इसके बाद मैदान पर दो-तीन साल तक पुराने उपकरण की मदद से खेती की जाती हैं।

 Shifting agriculture खेती के प्रकार

दो-तीन साल के बाद वहां की मिट्टी अन उत्पादक हो जाती हैं। ऐसा हो जाने पर किसान जंगल के दूसरे हिस्से में इसी तरह की प्रक्रिया को दोहराते हैं। और वह खेती करता हैं।

परिवार के निर्वाह के लिए की जाने वाली खेती को सबसिस्टेंस एग्रीकल्चर (जीविका खेती) कहा जाता हैं।

जीविका खेती के पीछे परिवार की जरूरत के आधार पर उत्पादन होता हैं।

खेती के प्रणाली में ज्यादातर किसान पुराने और परंपरागत तरीके ( types of farming in India ) के उपकरण का इस्तेमाल करते हैं।

 Subsistence farming खेती के प्रकार
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यह खेती सामान्य तौर पर आसाम और हिमालया क्षेत्र के आदिवासी समूह में की जाती हैं।

खेती के इस प्रणाली में जमीन से पाया जाने वाला अनाज, उपज परिवार के उपयोग में ही लाया जाता हैं।

भारत का रोटावेटर

फाल आर्मी वर्म

 

फसलों के उत्पादन के साथी पशुधन का उत्पादन कृषि की प्रणाली को मिश्रित खेती कहते हैं।

मिश्रित खेती का हेतु एक से अधिक स्त्रोत से आय प्राप्त करना होता है।

इस प्रणाली में ( types of farming in India ) मजदूरों को साल भर के लिए मजदूरी उपलब्ध करना है

Subsistence farming खेती के प्रकार
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कृषि के इस प्रणाली में जमीन से निरंतर उत्पादन प्राप्त किया जाता हैं।

भारत में की जाने वाली खेती प्रणाली के बारे में अधिक जानकारी के लिए नीचे के लिंक पड़े।

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अन्न सुरक्षा के प्रिसीजन फार्मिंग ( precision farming in India )

उर्वरकों का आविष्कार और सही इस्तेमाल करके पारंपरिक खेती की तुलना में फसलों की उत्पादकता में वृद्धि करना प्रिसिजन फार्मिंग  ( precision farming in  India ) के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। विश्व के सामने अन्न सुरक्षा का बहुत बडा ( food security in india ) संकट हैprecision farming in India

सुपर कंप्यूटरों, उपग्रहों, स्मार्ट उपकरणों, सूचना प्रौद्योगिकी आदि का उपयोग करके कृषि में सुधार करना, सही समय पर और सही जगह पर कृषि आदानों का उपयोग करके स्थायी उत्पादन को बढ़ाना है।

पारंपरिक खेती का उत्पादन बढ़ाने, फसलों की गुणवत्ता बढ़ाने, ऊर्जा संरक्षण और सूचना, प्रौद्योगिकी और प्रबंधन को एकीकृत करके पर्यावरण का संरक्षण करने के लिए प्रेसीजन फार्मिंग की जरूरत है।

प्रकृति के अतिक्रमण के बिना उपलब्ध संसाधनों के उपयुक्त इस्तेमाल के माध्यम से मानव की जरूरतों को कैसे पूरा किया जा सकता है।

इसके बुनियादी सिद्धांतों पर प्रिसिजन फार्मिंग (precision farming in India) होती है।

भारत जैसे विकासशील देशों में गरीब छोटे किसानों को स्थायी आय प्रदान करने में प्रिसिजन फार्मिंग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

प्रिसिजन फार्मिंग (precision farming in India) का उद्देश्य कृत्रिम रूप से इसका उपयोग करके उत्पादन लागत को कम करना है ।

कृषि उत्पादन में स्थिरता लाना है।

जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं, श्रम की कमी, रसायनों के भारी उपयोग आदि के कारण कृषि संकट में है।

कृषि के सामने कई समस्याएं हैं जैसे कम उत्पादकता, प्राकृतिक संसाधनों का नुकसान।

कृषि पर निर्भर एक बड़ी आबादी पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।

भूख और भुखमरी जैसी समस्याएं मानव जाति को त्रस्त कर रही हैं।

दुनिया की आबादी सात सौ मिलियन से अधिक है।

इतनी बड़ी आबादी को खिलाने, अन्न सुरक्षा ( food security in india) के लिए आने वाले वर्षों में प्रिसिजन फार्मिंग के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

सामग्री और उपकरण

  • ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS)

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जीपीएस किसी भी स्थान के अक्षांश और देशांतर को प्राप्त करने में मदद करता है।

स्थान निर्धारण के साथ मिट्टी की जानकारी जैसे कि मिट्टी के प्रकार, कीटों की जानकारी, बढ़े हुए खरपतवारों आदि को जीपीएस की मदद से किया जाता है।

  • सेंसर तकनीक(sensor technology)

विद्युत चुम्बकीय, कण्डक्टीविटी, अल्ट्रासाउंड,फोटोइलेक्ट्रिकिटी आधारित सेंसर तकनीक से

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आर्द्रता, वायु की गति, बाष्प की मात्रा, तापमान, वनस्पति विकास आदि को समझने में मदद मिलती है।

रिमोट सेंसिंग तकनीक फसलों की किस्मों, उनके द्वारा बनाए गए तनाव कीटों और उनकी पहचान, सूखे जैसी स्थिति की योजना, भूमि और फसल की स्थिति को समझने में मदद करती है।

बिना प्रयोगशाला के सेंसर की मदद से व्यापक डेटा विश्लेषण उपलब्ध है।

उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण करके, किसानों के लिए फसल योजना करना आसान है।

  • भौगोलिक सूचना प्रणाली ( geographic information systems)

जीआईएस हार्डवेयर सॉफ्टवेयर के संयोजन का उपयोग करके

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एक विशिष्ट विधि से जानकारी इकट्ठा करने, भंडारण, पुनर्प्राप्ति, स्थानिक जानकारी, भौगोलिक स्थिति और जानकारी इकट्ठा करने के लिए एक विकसित पद्धति है।

जीआईएस नक्शे एक स्थान पर संग्रहीत किए जाते हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर वे आसानी से उपलब्ध हों।

संग्रहीत जीआईएस नक्शे पारंपरिक मानचित्रों की तुलना में अलग हैं।

इसमें फसल की उत्पादकता, मृदा सर्वेक्षण, वर्षा की गती, फसलों, मिट्टी की उर्वरकता, कीटों आदि की जानकारी शामिल है।

  • ग्रिड मृदा नमूना और परिवर्तनीय दर प्रौद्योगिकी

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परीक्षण रिपोर्ट को एक जीआईएस मानचित्र पर एक कंप्यूटर की मदद से बड़े पैमाने पर खेत में या पूरे गांव के ग्रिड में मिट्टी के नमूने इकट्ठा करने पर रिकॉर्ड किया जाता है।

कंप्यूटर जीआईएस नक्शे का उपयोग कृषि में कीटनाशक के इस्तेमाल के परिमाण को नियंत्रित करने के लिए जीपीएस सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।

  • फसल प्रबंधन

उपग्रह की जानकारी किसानों को फसल, भूमि की स्थानीय संरचना के बारे में समझने में मदद करती है।

इस जानकारी के आधार पर किसान बीज, उर्वरक, दवाई, खरपतवार, पानी आदि जैसे इनपुट का उपयोग कर सकते हैं।

जो सही समय पर और सही जगह पर कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • दर नियंत्रक( rate controller)

स्वंयचालित प्रणाली के माध्यम से फसल को उर्वरक प्रदान करने के लिए विभिन्न दर नियंत्रक संयंत्रों का उपयोग किया जाता है।

  • सॉफ्टवेयर (software)

विभिन्न कृषि गतिविधियों को करने के लिए सॉफ्टवेयर का उपयोग शामिल है।

सॉफ्टवेयर का उपयोग विभिन्न संगठनों से जानकारी का विश्लेषण करने and जीआईएस आधारित मानचित्र बनाना है।

सभी प्रक्रियाओं की प्रतिकृति के माध्यम से किसानों तक जानकारी प्रसारित करने के लिए किया जाता है।

प्रिसिजन फार्मिंग का अवलंब करके हम अन्न सुरक्षा ( food security in India ) के संकट को परास्त कर सकते है

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Water footprint – वॉटर फुटप्रिंट

पानी ( वॉटर फुटप्रिंट  water footprint ) की कमी, कभी सुखा, हमारे सामने आने वाले असली सवाल है।

जल के कारण तीसरे विश्व महायुद्ध की भविष्यवाणी हमारे लिए चिंता का विषय है।

जल कि कमी दुनिया के सभी देशों को प्रभावित कर रही हैं। इसके शिकार ज्यादातर गरीब और विकासशील दोनों देश है।

पीछे मुख्य कारण कम बारिश के साथ पानी का बढ़ता उपयोग है। बढ़ता हुआ पानी पानी का उपयोग वॉटर फुटप्रिंट water footprint प्रभावित करता है।

नियोजन की कमी से यह प्रश्न और गंभीर होता जा रहा है।

पानी की कमी को दूर करने के लिए कई water footprint का अध्ययन जरुरी  हैं।

उस में प्रमुख रूप से वॉटर फुटप्रिंट के बारे में आज हम और थोड़ा जानने की कोशिश करेंगे ।

वॉटर फुटप्रिंट का मतलब है मनुष्य द्वारा उपयोग किया हुआ अथवा प्रदूषित किये हुए पानी का घनत्व नापना।

जो वस्तु हम इस्तेमाल करते हैं, खरीदते हैं या बेचते हैं, विभिन्न सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। इन सभी चीजों के उत्पाद में पानी का इस्तेमाल किया जाता है।

वॉटर फुटप्रिंट water footprint एक ऐसी इकाई है।

जिसका उपयोग किसी उत्पाद या सेवा के उत्पादन के लिए उपयुक्त पानी की मात्रा को नापने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

गणना माल के उत्पाद के लिए, कारखानों में उत्पादन के लिए या कार में इंधन के लिए।

या फिर बहुराष्ट्रीय कंपनियों में बनाए गए विभिन्न उत्पादन के लिए की जाती है।

वाटर फुटप्रिंट टन, प्रति हेक्टर, प्रति घन मीटर की इकाइयों में नापा जाता है। वाटर फुटप्रिंट का उद्देश्य यह समझना है। कि उपलब्ध स्वच्छ पानी का इस्तेमाल कैसे किया जाता है।

water footprint पीछे का उद्देश उन परिणामों को समझना है।

जल पीड़ित क्षेत्रों में वाटर फुटप्रिंट वाले उत्पादों या सेवाओं का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।

एक कप कॉफी यानी कि 125ml उत्पादन करने के लिए लगभग 140 लीटर पानी का इस्तेमाल किया जाता है।

काफी के बीज बोना यहां से पूरी प्रक्रिया होकर ग्राहक तक पहुंचने के लिए आवश्यक सभी पानी शामिल है।

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वॉटर फुटप्रिंट के प्रकार

१) ग्रीन water footprint  –

संबंध कृषी सिंचन से है । जिसमें वर्षा का पानी जो पौधों या फसलों के मूल क्षेत्र में संग्रहित किया जाता है।

फसलें द्वारा इस्तेमाल किया जाता है।

२) ब्लू water footprint –

जलाशय में संग्रहित पानी या भुजल शामिल है।

यह मुख्य रूप से कृषि सिंचाई उद्योग घरेलू उपयोग के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

३) ग्रे water footprint –

दूषित पानी को उपयोग में लाने के लिए जो साफ पानी का इस्तेमाल होता है।

उस का समावेश ग्रे water footprint में होता है।

वॉटर फुटप्रिंट वीडियो देखने के लिए

[embedyt] https://www.youtube.com/watch?v=538zzFOA1z0[/embedyt]

पानी का कैलकुलेशन

बारिश का पानी  ( barish ka Pani ) का कैलकुलेशन मिलीमीटर, सेंटीमीटर, इंच इसमें किया जाता है लेकिन जलाशय से जो जल विसर्ग होता है उसका नाप क्युसेक, क्युमेक मे किया जाता है।

बारिश की शुरुआत मृग नक्षत्र से होती है। हुत बारिश होने होने के कारण बड़े बड़े जलाशय पूरी तरह से पानी से भरने की और ज्यादा का पानी नीचे छोड़ने की न्यूज़ हम देखते हैं।

जैसे कि खड़कवासला जलाशय से एक हजार क्युसेक जल विसर्ग किया ऐसे हम सुनते हैं।

इस क्यूसेक के पीछे क्या राज है ऐसे सवाल हमारे मन में आते है। इसलिए पानी का मापक water volume calculator।

क्युसेक क्युमेक पानी का कैलकुलेशन barish ka Pani     Half girlfriend songs
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क्युसेक –

एक घन फिट पर सेकंड मतलब एक क्युब पर सेकंड।

हमने अभी देखा कि एक घन फिट जल यानी कि २८.३१ लीटर जल।

जिस समय खड़कवासला जलाशय से 1000 क्यूसेक जल विसर्ग किया ।

उस समय 1000*28.31 यानी कि 28,310 लीटर पानी पर सेकंड इस रफ्तार से विसर्ग किया जाता है।

बारिश का पानी (barish ka Pani) कैलकुलेशन तरह किसी भी जलाशय से 24 घंटा लगातार 11,500 क्यसेक के रफ्तार से जल विसर्ग किया गया ।

तो उस जलाशय की लेवल 24 घंटे के बाद 1 टिसीएम से कम हो जाती है।

क्युमेक –

क्युसेक में पानी water volume calculator  घन फीट में नापा जाता है तो क्युमेक में पानी घन मीटर में नापा जाता है।

1 क्युमेक पानी यानी पर सेकंड 1000 लिटर पानी।

इसका मतलब 1000 क्युमेक इस परीमाण से पानी का विसर्ग किया जाता है।

तो 1000 *1000 ऐसे 1000000 लीटर पानी  water volume calculator  पर सेकंड इस गति से नदी पात्र में जा रहा होगा।

1 फीट*1 फीट*1 फिट=1 घन फिट

1 घन फीट=28.31 लीटर्स पानी

28.31 लीटर पानी मतलब लगभग दो बकेट्स पानी ।

1 दशलक्ष घन फिट (1 एमसीएफटी) मतलब 10,00,000 घन फिट  पानी ।

1,000 दशलक्ष घन फीट=1 टीएमसी पानी (एक अब्ज घन फिट पानी)

जलाशय की जल क्षमता टीएमसी में नापी (पानी का गणित) जाती है।

कोयना जलाशय की जलक्षमता 105 टीएमसी (105 करोड़ घन फिट पानी)  पानी का मापक पानी का कैलकुलेशन इतनी बड़ी है।

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अल नीनो

अल नीनो  प्रशांत महासागर के क्षेत्र में घटने वाली एक घटना है।

जो दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वेडोर और पेरू देशों के तकिया समुद्र जल में कुछ सालों के अंतराल पर घटित होती है।
समुद्र के जल के तापमान में बढ़ोतरी होती है।

अल नीनो
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समुद्री जल के तापमान में बढ़ोत्तरी, हवाओं की दिशा में बदलाव तथा कमजोर पड़ने की विशेष भूमिका निभाती है।

अल नीनो के प्रभाव से वर्षा के प्रमुख क्षेत्र बदल जाते हैं। परिणाम स्वरूप जिस क्षेत्र में कम बारिश होती है।

उसमें अधिक तथा के जिस क्षेत्र में अधिक बारिश होती है उस क्षेत्र में कम होने लगती है।

अल नीनो स्पेनिश भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटा बच्चा।

इसकी शुरुआत साधारणतः क्रिसमस के आसपास होती है। प्रशांत महासागर के जल में तापमान में वृद्धि होती है।

प्रभाव के दौरान व्यापारिक हवाएं मध्य एवं पश्चिमी प्रशांत महासागर में शांत होती है।

सबसे गर्म जल को सतह  पर जमा होने में मदद मिलती है।

ठंड जल के जमाव से पैदा हुए पोषक तत्व को नीचे खिसकना पड़ता है।

मछलियां तथा अन्य जलीय कवक जिवो का नाश होता है को नाश होता है।

इसके कारण समुद्र पक्षियों को कम भोजन मिलता हैं। इसे ही अल नीनो प्रभाव कहते हैं।

यही मौसम में रुकावट डालने के लिए जिम्मेदार है।

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Agriculture AI- कृषी के लिए वाटसन डिसीजन प्लेटफॉर्म

कृषी के लिए वाटसन डिसीजन प्लेटफॉर्म

वाटसन डिसीजन प्लेटफार्म में डाटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता Agriculture AI का एकत्रित उपयोग किया है।

इसके मदद से किसानों को मौसम, कृषि के संबंधित और जानकारी वक़्त पर मिलने में आसानी होगी।

वाटसन डिसीजन प्लेटफॉर्म काम कैसे करता है-

खेतों से जानकारी प्राप्त करने के लिए कुछ खेत इलेक्ट्रॉनिक फील्ड रिकॉर्ड ( EFR) (electronic field record) तैयार किए जाएंगे।

खेतों से मिलने वाला डाटा एनालिसिस Agriculture AI किया जाएगा।

1) उच्च प्रति की प्रतिमाएं- खेतों की प्रतिमाएं सेटेलाइट ड्रोन और हवाई जहाज द्वारा ले जायेंगे।

2) खेतों में किए जाने वाले उपचार- यह जानकारी किसानों से ली जाएगी जिसमें बुवाई, खाद डालना, सिंचाई फसल की कटाई आदि जानकारी होगी।

3) मृदा की जानकारी – मृदा की नमी, मिट्टी के पोषक तत्व आदि जानकारी ली जाएगी।

4) मौसम- इसमें मौसम की जानकारी, मौसम का अनुमान, गत कालीन मौसम की गतिविधियां आदि जानकारी ली जाएगी।

खेतों से जानकारी जमा करने के लिए अनेक प्रकार के सेंसर Agriculture AI का भी उपयोग किया जाएगा।

यह सब डाटा जमा होने के बाद वाटसन सुपर कंप्यूटर उस पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, आधुनिक पृथक्करण करके उसमें से महत्वपूर्ण जानकारी तैयार कर किसानों को भेजी जाएगी।

यह सब जानकारी किसानों को अपने स्मार्ट डिवाइस पर प्राप्त होगी। किसानों को इसकी मदद से अपने खेती में विविध निर्णय लेने में आसानी होगी।

उदाहरण के तौर पर ड्रोन द्वारा ली गई हाई डेफिनेशन इमेज से फसल पर आने वाले रोग तथा कीट का प्राथमिक अवस्था में ही पता चल जाएगा।

सही समय पर जानकारी मिलने से किसान रोग तथा कीट से अपने फसल को बचा पाएंगे।

वाटसन प्लेटफॉर्म  Agriculture AI के बारे में अधिक जानकारी के लिए हमारे अन्य लेख पढ़ें।

IBM Watson – आईबीएम वॉटसन

IBM Watson
वॉटसन डिजिटल प्लेटफॉर्म  IBM Watson  एक सुपर कंप्यूटर है जो कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित है।

सामान्य तौर पर सवाल जवाब (question-answering) करने वाला सुपरकंप्यूटर है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म आईबीएम के फाउंडर थॉमस वॉटसन IBM Watson  का नाम दिया गया है। इसे 2011 में विकसित किया गया।

अन्य सर्च इंजन डॉक्यूमेंट खोज करते हैं जो डॉक्यूमेंट की लोकप्रियता और वेबसाइट की रैंकिंग पर आधारित होता है।

पद्धति से आने वाले सुझाव से उपभोक्ता को अंतिम परिणाम तक पहुंचने में काफी समय व्यतीत करना पड़ता है।

तुलना में q&a टेक्नोलॉजी उपभोक्ता के अपनी भाषा में सवाल खोजने की कोशिश करती है। परिणाम तहा यूजर को अपनी भाषा में जल्द सुझाव  मिलते हैं।

IBM Watson
www.ibm.com

IBM Watson में आईबीएम ने विकसित किया DeepQA सॉफ्टवेयर और Apache फ्रेमवर्क का इस्तेमाल किया गया है।

Java, C++ जैसे विभिन्न भाषाओं का इसमें प्रयोग किया गया है।

कुछ दिन पहले की कृषि विभाग,  भारत सरकार आईबीएम वॉटसन  के साथ एक समझौता किया है।

IBM Watson की मदद से किसानों को मौसम की जानकारी दी जाएगी।

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मौसम सुचना के लिए आईबीएम के साथ समन्वय

केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने मौसम सुचना और मिट्टी की नमी की जानकारी किसानों को उपलब्ध कराने के लिए आईटी दिग्गज आईबीएम (IBM)  के साथ करार (statement of intent )किया है।

इस योजना के तहत, भोपाल (मध्य प्रदेश), राजकोट (राजस्थान) और नांदेड़ (महाराष्ट्र) के तीन जिलों में चालू खरीफ सीजन में प्रायोगिक आधार पर लागू किया जाएगा।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि मौसम की जानकारी किसानों तक पहुंचेगी और उनकी उत्पादकता बढ़ाएगी।

इसके अलावा, समग्र कृषि क्षेत्र विकसित होने में मददगार साबित होगा।

किसानों को बाढ़, बारिश ना होना, हिमपात जैसे समस्या को सामना करना पड़ता है।

मौसम सुचना की समय पर उपलब्धता ना होने के कारण, किसानों की फसल बर्बाद हो जाती है।

मौसम सुचना
http://www.nwclimate.org/

आईबीएम के वाटसन डिसिजन प्लॉट फॉर्म कृत्रिम बुद्धिमत्ता (artificial intelligence)

की मदद से ग्रामीण स्तर पर मौसम सुचना और मृदा की नमी की जानकारी देगा।

मौसम सुचना और मृदा की नमी कीजानकारी किसानों को फसल की खेती और प्रबंधन के बारे में निर्णय लेने में मदद करेगी।

सभी क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग बढ़ा है।

कृषि क्षेत्र उनसे बहुत पीछे था।

आईबीएम की मदद से इस कमी को दूर करने में मदद मिलेगी।

किसानों के लिए कृषि किओस्क

हरियाणा के कृषि मंत्री ओम प्रकाश धनखड़ ने कृषि कियोस्क ( Krishi Kiosk ) का उद्घाटन किया।

कृषि किओस्क Krishi Kiosk का उद्देश्य मुख्य रूप से सरकार द्वारा कार्यान्वित विभिन्न कृषि योजनाओं के बारे में किसानों को जानकारी देना और

साथ ही प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना में अधिकतम किसानों को समायोजित करना है।

कृषि कियोस्क Krishi Kiosk को डिजिटल किसान सुविधा योजना के तहत कार्यान्वित किया जा रहा है।

जिसका उद्देश्य किसानों को सेवाएं प्रदान करना है।

इसके अलावा, मंत्रीमहोदय ने सूचना रथ का उद्घाटन किया।


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सुचनारथ के माध्यम से किसानों के बीच फसल के अवशेषों को नहीं जलाने के बारे में जागरूकता पैदा की जाएगी।

220 सूचना रथ हरियाणा में किसानो को जानकारी देने का काम करेंगे।

krishi kiosk
http://indianewscalling.com

किसानों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों को फसलों के अवशेष नहीं जलाने चाहिए।
विभिन्न उपकरणों की मदद से, इसे क्षेत्र में रीसायकल करने का प्रयास करें।

उपकरणों के उपयोग के लिए हरियाणा सरकार 50% अनुदान दे रही है।

उन्होंने कहा कि किसानों के लिए हरियाणा सरकार द्वारा किसान हरियाणा एप तैयार किए जा रहा हैं।

Krishi Kiosk एप के माध्यम से, योजना से संबंधित जानकारी किसानों को उपलब्ध होगी।

जैव उर्वरक के प्रकार

types of biofertilizers
 

जैव उर्वरक ( Types of bio fertilizers ) एक प्रकार के जीव होते हैं जो मृदा की पोषण गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। यह जीवाणु कवक  तथा सायनोबैक्टीरिया के मुख्य स्त्रोत होते हैं।

मित्र कवक पादपो के साथ सहजीवी संबंध स्थापित करते हैं। ग्लोमस जिनस के बहुत से सदस्य माइक्रोराइजा बनाते हैं।

सहजीवन में कवकीय सहजीवी मृदा से फास्फोरस का अवशोषण कर उसे पादपों में भेज देते हैं।

साइनोबैक्टीरिया स्वपोषीत जिव है जो जलीय तथा स्थलीय वायुमंडल में विस्तृत रूप से पाए जाते हैं।

फसलों में जैव उर्वरकों types of bio fertilizers का इस्तेमाल करने से वायुमंडल में उपस्थित नाइट्रोजन पौधों को सुगमता से उपलब्ध होती है।

तथा भूमि में पहले से मौजूद घुलनशील फास्फोरस आदि पोषक तत्व घुलनशील अवस्था में परिवर्तित होकर पौधों को आसानी से उपलब्ध होते हैं।

वास्तव में जैव उर्वरक  types of bio fertilizers विशेष एवं किसी नमी धारक पदार्थ के मिश्रण है।

विशेष सूक्ष्म जीव की निर्धारित मात्रा को किसी नमी धारक धुलिय पदार्थ चारकोल लिग्नाइट आदि में मिलाकर उर्वरक तैयार किए जाते हैं।

जैव उर्वरक types of bio fertilizers
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जैव उर्वरक के प्रकार types of biofertilizers
1) एक्टिनोराइजा actinorhiza

एक्टीनोमाइसीट्स समूह के जीवाणु जो अदलहनी वृक्षों की जड़ों में गांठे बनाकर नाइट्रोजन स्थिरीकरण कहते हैं उन्हें एक्टिनर्व राजा कहलाते हैं।

फ्रैंकिया इसका बहुत types of bio fertilizers अच्छा उदाहरण है।

2) फास्फेट घुलनशील सूक्ष्मजीव 

यह उन सूक्ष्म जिवों का समूह है जो कि मृदा में उपस्थित घुलनशील फास्फेट में परिवर्तित कर जैव उर्वरक की कार्य क्षमता को बढ़ाता है।

फास्पेट को घुलनशील बनाने वाले जीवाणू  का कल्चर बाजार में पीएसबी कल्चर के नाम से मिल जाता है।

पीएसबी जैव उर्वरक types of bio fertilizers के प्रयोग से फास्फोरस तत्व को पौधे आसानी से ग्रहण कर लेते हैं।

यह एक अनिवार्य एरोबिक जैविक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाला सूक्ष्म जीवाणु है।

जो अपने मेटाबोलिक गतिविधियों के द्वारा अम्ल का स्राव करता है।

3) एजोस्पिरिलम azospirillum

यह जैव उर्वरक भी नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाला एक शख्स में जवानों है जो गैर दलहनी पौधों के लिए लाभकारी होता है।

4) एजोटोबेक्टर acetobacter

एजोटोबेक्टर अति सूक्ष्म हिटेरोट्रेफिक जीवाणु है। यह स्वतंत्र रूप से रहने वाला सूक्ष्मा जीव है।

जो बिना किसी सहजीवन के नाइट्रोजन का मुक्त रूप से जैविक स्तिरीकरण करता है।

5) नील हरित शैवाल 

नील हरित शैवाल साइनोबैक्टीरिया एक जीवाणु होता है जो प्रकाश संश्लेषण से ऊर्जा उत्पादन करते हैं।

साइनोबैक्टीरिया विटामिन १२ए ऑक्सीन और एस्कोरबिक अम्ल स्रावित करते हैं जो धान के पौधों की वृद्धि में सहायक होते हैं।

6) एजोला 

सामान्यतः एजोला धान के खेत या उथले पानी में उगाई जाती है।

एजोला की पंखुड़ियों में एना बिना नामक नील हरित का के जाति types of bio fertilizers का एक सूक्ष्म जीव होता है जो सूर्य के प्रकाश में वायुमंडलीय नाइट्रोजन का योगिकिकरण करता है।

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