बेर – ber fruit

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बेर (वानस्पतिक नाम : Ziziphus mauritiana)
ber fruit फल का एक प्रकार हैं। कच्चे फल हरे रंग के होते हैं।
पकने पर थोड़ा लाल या लाल-हरे रंग के हो जाते हैं। बेर के पके फल ताजे खाये जाते हैं।
बेर ( ber fruit ) के फलों का प्रयोग ताजे फलों के रूप में, सुखाकर छुआरों के रूप में शरबत, जेल, मुरब्बा, कैंडी, चटनी एवं अचार बनाकर किया जाता है।
बेर ber fruit के पौधे का लाख के कीड़ों को पालने में और इसके पत्तों का प्रयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है।
लकड़ी जलाने के उपयोग में भी ली जाती है। बेर हमारे लिए एक बहुपयोगी और पोषक फल है।
विटामिन ‘सी’ तथा ‘ए’ प्रचुर मात्र में होते हैं।
विटामिनों के अलावा बेर में कैल्शियम, फ़ॉस्फ़रस तथा आयरन आदि खनिज लवण भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
मौसमी फलों में सभी वर्गों में यह बहुत लोकप्रिय है।
पोषकता के आधार पर इसे सेब फल के अनुरूप ही पाया जाता है।
बेर  ber fruit भारत व चीन का प्राचीन लोकप्रिय फल है। यह रैमनैसी कुल से सम्बन्धित है। तथा जिजीफस जीनस (वंश) के अंतर्गत आता है।
फल का उत्पत्ति सम्भवत: दक्षिणी चीन, भारत व मलाया में हुआ।
जीनस के अंतर्गत लगभग 50 जातियाँ (स्पीसीज) हैं जिनमें लगभग 18-20 भारत में पाई जाती हैं।
व्यावसायिक दृष्टि से कुछ ही जातियाँ उपयोगी हैं। हमारे देश में व्यावसायिक दृष्टि से बागवानी के लिये जिजीफस मोरीशियाना तथा चीन में जिजीफस जुजुबा का उपयोग किया जाता है।
भारत में भी बेर ber fruit की खेती विभिन्न क्षेत्रों में सफलतापुर्वक की जाती है।
खेती मुख्य तौर पर मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राज्यस्थान, गुजरात, महांराष्ट्र, तामिलनाडू और आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में की जाती है।
हमारे देश में इसकी खेती अनुमानत: 22,000 हेक्टेयर क्षेत्र में हो रही है।
प्रतिवर्ष विशेषकर बंजर भूमि में व्यावसायिक खेती बढ़ जाती है।
एक बहुवर्षीय व बहुउपयोगी फलदार पेड़ है। जिसमें फलों के अतिरिक्त पेड़ के अन्य भागों का भी आर्थिक महत्व है।
बेर ber fruit की खेती आमतौर पर शुष्क इलाकों में की जाती है।
जलवायु
बेर ber fruit खेती ऊष्ण व उपोष्ण जलवायु में आसानी से की जा सकती है। क्योंकि इसमें कम पानी व सूखे से लड़ने की विशेष क्षमता होती है।
बेर में वानस्पतिक बढ़वार वर्षा ऋतु के दौरान व फूल वर्षा ऋतु के आखिर में आते है।
फल वर्षा की भूमिगत नमी के कम होने तथा तापमान बढ़ने से पहले ही पक जाते है।
खेती समुन्द्र तल 1000 मीटर कि ऊंचाई तक सफलता पूर्वक कि जा सकती है।
गर्मियों में पौधे सुषुप्तावस्था में प्रवेश कर जाते है।
व उस समय पत्तियाँ अपने आप ही झड़ जाती है। तब पानी की आवश्यकता नहीं के बराबर होती है।
तरह बेर अधिक तापमान तो सहन कर लेता है।
लेकिन शीत ऋतु में पड़ने वाले पाले के प्रति अति संवेदनशील होता है।
अतः ऐसे क्षेत्रों में जहां नियमित रूप से पाला पड़ने की सम्भावना रहती है। इसकी खेती नहीं करनी चाहिए।
मिट्टी
बेर ber fruit की बागवानी विभिन्न प्रकार की मिट्टी जैसे: उथली, गहरी, कंकरीली, रेतीली, चिकनी आदि में की जा सकती है।
अतिरिक्त लवणीय, क्षारीय दशा में भी उगने की क्षमता रखता है।
पौधे 40-50 प्रतिशत विनिमयशील सोडियम (क्षारीय) तथा 12-15 मिलीम्होज प्रति सें.मी. विद्युत् चालकता वाली लवणीय भूमि में सफलता पूर्वक की जा रही है।
बलुई दोमट मिट्टी जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो इसके लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
हालाकि बलुई मिट्टी में भी समुचित मात्रा में देशी खाद का उपयोग करके इसकी खेती की जा सकती है।
किन्तु वे क्षेत्र जहाँ की जमीन नीची, रेतीली, उसरीली, बंजर जहाँ अन्य फसलें व फल वृक्ष नही उगाये जा सकते,
वहाँ भी सीमित साधनों के साथ बेर की बागवानी सफलता पूर्वक की जा सकती है।
राजस्थान कि रेतीली से महारास्ट्र कि काली मिटटी में भी यह खूब पनपती है।
किस्में
बेर ber fruit में 300 से भी अधिक किस्में विकसित की जा चुकी है।
सभी किस्में बारानी क्षेत्रों में विशेषकर कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नहीं है।
ऐसे क्षेत्रों के लिए अगेती व मध्यम अवधि में पकने वाली किस्में ज्यादा उपयुक्त पाई गई है।
किस्मों का विकास विभिन्न क्षेत्रों में फल के भौतिक तथा रासायनिक गुणों जैसे फल का रंग, आकार, वजन, मिठास व खटास की मात्रा के आधार पर चयन द्वारा किया गया है।
व्यावसायिक किस्मों का वर्गीकरण फलों के पकने के समय के आधार पर किया गया है।
बेर की कुछ किस्में अपने विशेष स्वाद, कुछ आकार व कुछ अधिक पैदावार के लिये प्रसिद्ध हैं।
अगेती किस्में
ber fruit गोला- फल का आकार गोल, माप 3.0 x 2.8 सें.मी. प्रति फल औसत भार 16.5 ग्रा.,
पकने पर रंग हल्का पीला व चमकदार, गूदा 95.2 प्रतिशत मुलायम, रसीला, मीठा,
सफेद, कुल घुलनशील ठोस पदार्थ 15.5 प्रतिशत खटास 0.12 प्रतिशत, विटामिन ‘सी’ 90 मिग्रा./100 ग्रा. गूदा, औसत पैदावार 80 कि.ग्रा. प्रति पेड़।
काला गोरा:
फल ber fruit का आकार लम्बा, माप 3.5 x 2.8 सें.मी. प्रति फल औसत भार 16.5 ग्रा.,
पकने पर रंग हल्का पीला व चमकदार, गूदा 95.2 प्रतिशत मुलायम, रसीला, मीठा सफेद
कुल घुलनशील ठोस पदार्थ 15.5 प्रतिशत खटास 0.12 प्रतिशत, विटामिन ‘सी’ 90 मिग्रा./100 ग्रा. गुदा, औसत पैदावार 80 किग्रा. प्रति पड़े।
मध्य मौसमी किस्में
बनारसी कड़ाका:
ber fruit एक प्रसिद्ध किस्म है। जिसकी बागवानी देश के अनेक भागों में काफी पहले से होती आ रही है।
फल का आकार लम्बा, सिरा गुठल, माप 4.1 x 2.7 सें.मी.,
प्रति फल औसत भार 17.0 ग्राम, पकने पर रंग भूरापन लिये हुए पीला, छिलका पतला, गूदा 95.5 प्रतिशत, मुलायम, रसीला, मक्खन की तरह सफेद, मीठा,
कुल घुलनशील ठोस पदार्थ 15.0 प्रतिशत, खटास 0.15 प्रतिशत, विटामिन ‘सी’ 128 मिग्रा./100 ग्राम गूदा, औसत पैदावार 125 किग्रा. प्रति पेड़।
कैथली:
फल ber fruit का आकार लम्बा, माप 3.5 x 2.5 सें.मी., प्रति फल औसत वजन 18.0 ग्रा.
पकने पर रंग भूरापन लिये हुए पीला, छिलका पतला, गूदा 96.4 प्रतिशत,
सफेद, मुलायम, मीठा, कुल घुलनशील ठोस पदार्थ 15.0 प्रतिशत, खटास 0.16 प्रतिशत, विटामिन ‘सी’ 85 मिग्रा./100 ग्रा. गूदा,
औसत पैदावार लगभग 125 कि.ग्रा. प्रति पेड़। यह बारानी क्षेत्र के लिये अच्छी किस्म है।
मुड़िया मुरहरा:
फल का आकार लगभग घंटी के आकार की तरह है। माप 4.8 x 3.0 सें.मी., प्रति फल औसत वजन 25.0 ग्रा.
पकने पर रंग पीला, गूदा 95.1 प्रतिशत, मुलायम, मीठा,
कुल घुलनशील ठोस पदार्थ 17.0 प्रतिशत, खटास 0.13 प्रतिशत, विटामिन ‘सी’ 90 मिग्रा./100 ग्रा. गूदा, पैदावार लगभग 125 कि.ग्रा. प्रति पेड़।
बनारसी : पैबंदी : यह भी मध्यम समय में तैयार होने वाली किस्म है। फल बड़े अंडाकार एवं नुकीले पेंदी वाले होते है।
फलो कि 4.25 से.मी. एवं ब्यास लगभग 2.5 से.मी. होता है। सम्पूर्ण घुलन शील पदार्थ 18% औसत पाए जाते लम्बाई है। .
जोगिया : यह किस्म मध्यम समय में तैयार होती फल – पीले रंग के तथा मध्यम आकार वाले होते है।
फलो का गुदा मुलायम तथा रसीला होता है।
इनकी भण्डारण क्षमता अच्छी नहीं होती है। सम्पूर्ण घुलनशील पदार्थ लगभग 16% हारे होता है। .
देर से तैयार होने वाली किस्में
उमरान:
यह अधिक पैदावार देने वाली किस्म है।
फल आकार में काफी बड़े माप 4.3 3.2 सें.मी., प्रतिफल वजन 24.0 ग्रा.,
पकने पर रंग भूरापन लिये हुए पीला, छिलका मोटा, गूदा 91.2 प्रतिशत, कुछ सख्त, मक्खनी रंग का तथा खाने में मीठा,
कुल घुलनशील ठोस पदार्थ 15.2 प्रतिशत, खटास 0.21 प्रतिशत, विटामिन ‘सी’ 115 मि.ग्रा. प्रति 100 ग्रा. गूदा, औसत पैदावार लगभग 150 कि.ग्रा. प्रति पेड़।
सम्पूर्ण घुलन शील पदार्थ 17.5 से 19% होते है।
भण्डारण क्षमता अच्छी होती है। गुदा व गुठली का अनुपात 11 और 8 होता है। .
दनदन: यह देर से तैयार होने वाली किस्म है। इसके फल अंडाकार 3.9 से.मी. लम्बे तथा 2.9 से.मी. ब्यास के होते है। फलो का रंग नीबू पिला जैसा , सतह पर धारियां होती है।
गुदा मुलायम तथा सफ़ेद रंग का होता है।
सम्पूर्ण घुलनशील पदार्थ लगभग 16 % होता है। इसकी भण्डारण क्षमता अधिक होती है।
सेब बेर : यह भी देर से तैयार होने वाली किस्म है। फलो का आकार मध्यम बड़ा पेंदी दबी हुयी तथा छिलका मोटा होता है।
गुदा हलके क्रीम रंग का एवं काफी मिटा होता है। सम्पूर्ण घुलनशील पदार्थ लगभग 19% होती है।
अन्य किस्में- वालाती, सनौर 2, मेहरून, परभनी, इलायची, सनम 5, गोमाकीर्ति आदि भी प्रमुख किस्में है।
फसल फल पकने का समय
अगेती जनवरी का प्रथम सप्ताह
मध्यम जनवरी का अंतिम सप्ताह
पछेती फरवरी अंतिम सप्ताह से मार्च प्रथम सप्ताह
राज्य अनुसार किस्में
उत्तर प्रदेश : बनारसी कडाका, बनारसी, पैवन्दी, नरमा, अलीगंज
पंजाब, हरियाणा : उमरान, कैथली, गोला, सफेदा, सोनोर- 2, पौंड
राजस्थान : सौनोर, थोर्नलैस, गोला , सेव , मुडिया एवं जोगिया
बिहार : बनारसी, नागपुरी, पैवन्दी, थर्नलैस
दिल्ली : गोला, मुड़या महरेश, उमरान, पोंडा
महाराष्ट्र : कोथो, महरूम, उमरान
आंध्र प्रदेश : बनारसी, दोढीया, उमरान
प्रवर्धन-
बेर का प्रवर्धन मुख्य रूप से कलिकायन द्वारा किया जाता है। इसके मूलकृत तैयार किये जाते हैं।
जो पूरी तरह पके हुए फलों से बीज लेकर तैयार किये जाते हैं।
बीजों को 17 से 18 प्रतिशत नमक के घोल में 24 घंटों के लिए भिगो कर रखें, फिर अप्रैल के महीने नर्सरी में बिजाई करें।
पंक्ति से पंक्ति का फासला 15 से 20 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे का फासला 30 सैंटीमीटर होना चाहिए।
3 से 4 सप्ताह बाद बीज अंकुरन होना शुरू हो जाता है। और पौधा अगस्त महीने में कलम लगाने के लिए तैयार हो जाता है।
कभी कभी बीजों की बुवाई तैयार थैलियों में कर देते हैं।
25×15 सेंटीमीटर की पॉलिथीन की थैलियों (300 गेज) में 1:1:1 के अनुपात में चिकनी मिट्टी, बलुई मिट्टी और गोबर की खाद का मिश्रण भर देते हैं।
कलिका अच्छी फ़सल देने वाली इच्छित क़िस्म के पौध से ली जाती है।
कलिकायन के लिए वलय (रिंग) तथा शील्ड विधि प्रवर्धन के लिए उपयोगी पाए गए हैं। कलिका ऐसी शाखा से ली जाये जो स्वस्थ हो।
बाग़ की स्थापना
बेर के पेड़ की आयु लगभग 100 वर्ष आंकी गई है। इसलिए बाग लगाने के लिए योजना सोच समझकर बनानी चाहिए
अन्यथा एक बार की गई गलती बाग़ के पूरे जीवन काल तक नहीं सुधारी जा सकती।
कई बातें जैसे बेर की किस्म, स्थान का चयन, खेत की तैयारी (विशेषकर क्षारीय व लवणीय मृदा में), पौध रोपाई का समय आदि।
बाग़ लगाने के पहले इन पर उचित विचार करना आवश्यक है।
जहाँ तक संभव हो, खेत में मेडबंदी करके खेत को समतल कर लें। यदि भूमि उसरीली है।
तो ढैंचा की हरी खाद द्वारा भी जीवांश की मात्रा बढ़ाकर भूमि को उपजाऊ बनाया जा सकता है।
बारानी क्षेत्र में मेडबंदी आवश्यक है।
ताकि वर्षा के जल का समुचित उपयोग हो सके।
पौधे लगाने से पहले 60x60x60 सैंटीमीटर के गड्ढे खोदें, जहां आप ने मिट्टी और खाद का मिश्रण डाला था, उसके बीच में इसके बाद पौधों को इन गड्ढों में लगा दें।
सिंचाई कर के मिट्टी को दबा दे। जहाँ लाइन से लाइन तथा पौध से पौध की दूरी समान होती है।
पौधों के आपस की दूरी भूमि की दशा पर भी निर्भर करती है।
उपजाऊ मिट्टी में दूरी अधिक तथा अनुपजाऊ या उसरीली मृदा में दूरी कम रखी जाती है। क्योंकि पौधों का विकास कम होता है।
बेर का बाग़ 8 x 8 मीटर की दूरी पर लगाया जाना चाहिए।
बेर के साथ आँवला या अमरुद पूरक फसल के रूप में लगाया जा सकता है।
विभिन्न प्रकार की बंजर भूमि में आँवले के साथ बेर को पूरक पौधे के रूप में रोपण करने की प्रथा प्रचलित हो रही है।
बेर के पौधे से दूसरे अथवा तीसरे वर्ष फलत की शुरुआत हो जाने के कारण बागवानों को आय मिलनी शुरू जो जाती है।
बेर की खेती के लिए पौधों की रोपाई फरवरी से मार्च और अगस्त से सितंबर महीने में कि जाती है।
सिंचाई
नये लगाये गये बाग़ की सिंचाई 15-20 दिनों के अंतराल पर थाला विधि से करते है। जिससे पौधे अच्छी तरह स्थापित हो जाय।
प्रत्येक सिंचाई के बाद बाग़ से खरपतवार निकालते रहते हैं जिससे बाग़ की नमी व पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं।
बेर के फलों की तुड़ाई अप्रैल के मध्य तक समाप्त हो जाती है।
फल तुड़ाई के बाद धीरे-धीरे प्रसुप्त-अवस्था में प्रवेश करने लगता है।
मई-जून के महीने में पत्ती विहीन होता है।
इस प्रकार अप्रैल से जून तक इन्हें पानी की आवश्यकता नहीं होती। यदि सिंचाई के साधन उपलब्ध हो तो मध्य जून में पहली सिंचाई की जाती है।
इसी के साथ खाद एवं उर्वरक की पहली मात्रा भी दे देते हैं।
वर्षा ऋतु के प्रारम्भ के साथ पौधे में नई फुटाव शुरू हो जाती है।
जिसके लिए वर्षा का पानी ही पर्याप्त है। सितम्बर-अक्टूबर फूल निकलने का समय है।
बाग़ की सिंचाई नहीं की जाती है। मध्य नवम्बर तक फलन पूरा हो जाता है।
फलों की वृद्धि के लिए बाग़ में नमी की आवश्यकता पड़ती है।
अन्यथा काफी संख्या में फल गिर जाते हैं। यदि संभव हो तो अच्छी पैदावार के लिए इस समय एक सिंचाई आवश्यक है।
इसके बाद 1-2 सिंचाई जनवरी-फरवरी में किया जाता है।
जो पैदावार में वृद्धि तथा अच्छे गुण वाले फल प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।
खाद एवं उर्वरक
कम्पोस्ट या गोबर की खाद की पूरी मात्रा तथा आधी यूरिया की मात्रा जून-जुलाई तथा शेष यूरिया की मात्रा फलन के बाद नवम्बर-दिसम्बर में दी जानी चाहिए।
उर्वरक देने के बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए। यदि वर्षा की सम्भावना है।
या वर्षा कुछ पहले हुई हो तो सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
बारानी क्षेत्रों में 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का दो पर्णीय छिड़काव पहला फूल लगने के पहले तथा दूसरा फलन के बाद लाभदायक है।
आवश्यकतानुसार फास्फोरस तथा पोटाश का प्रयोग भी किया जाना चाहिए।
खाद एवं उर्वरक निम्न दर्शायी गयी तालिका के अनुसार डालें:- उर्वरक की मात्रा
किलोग्राम प्रति पेड़
पेड़ आयु (वर्ष)
गोबर की खाद
यूरिया
सुपर फास्फेट
म्यूरेट आफ पोटाश
1.
10
0.22
0.35
0.08
2.
20
0.44
0.70
0.16
3.
20
1.10
1.40
0.20
4.
25
1.20
1.75
0.25
5 वर्ष और उसके बाद
30
1.20
1.75
0.25
सिंधाई व काट-छांट
प्रारम्भिक अवस्था में स्वस्थ ढाँचा बनाने हेतु पौधों की कटाई-छंटाई आवश्यक है।
ढाँचा प्रदान करने का काम 2-3 वर्ष में पूरा कर लिया जाता है।
तथा चौथे वर्ष पहली फल ली जाती है। उचित संधाई के लिए पौध लगाने के पश्चात बांस की डंडियों की सहायता से पौधे को सीधा रखना चाहिए।
भूमि से 75 सें.मी. तक की शाखायें निकाल देते हैं तथा इसके ऊपर 4-5 शाखायें, जो चारों दिशाओं में विकसित हों, ढाँचा बनाने के लिए चुनी जाती है।
इन्हीं शाखों को पूरे पेड़ के रूप में विकसित किया जाता है।
बेर में फूल नई बढ़वार के साथ पत्तियों के कक्ष से निकलती है। अत: स्वस्थ व उचित बढ़वार के लिए प्रति वर्ष नियमित कटाई-छंटाई आवश्यक है।
नियमित कटाई न करने से पौधे की फलन शक्ति प्रति वर्ष घटती जाती है। तथा फल भी अच्छे गुणों वाले नही मिलते।
नियमित छंटाई न करने के कारण अंदर का भाग खाली हो जाता है।
कुछ ही वर्षो में शीर्ष फलन होने लगती है। कटाई-छंटाई का कार्य फलों की तुड़ाई के पश्चात की जाती है।
बेर में कटाई-छंटाई का सबसे अच्छा समय मई महीना है।
दौरान पौधे पत्ती विहीन होते हैं। यदि बाग कमजोर व कम उपजाऊ भूमि में लगाया गया है।
तो कटाई के समय एक वर्ष पुरानी शाखाओं का 50 प्रतिशत भाग काटकर निकाल देते हैं।
यदि भूमि उपजाऊ हो तो केवल 25-30 प्रतिशत भाग काटा जाता है।
कटाई-छंटाई के समय एक दूसरे से रगड़ने वाली, सूखी व रोगी शाखाओं को भी समूल निकाल देना चाहिए।
कटाई पश्चात ब्लाइटाक्स कवकनाशी का गाढ़ा घोल बनाकर कटे स्थान पर लगा देते हैं।
अंतर फसलें-
किसान भाई बेर की खेती या बागों से पहले तीन से चार साल अन्य फसलों की बिजाई कर सकते हैं
जैसे दलहनी और सब्जी वाली फसलें जो कम पोषक तत्व लेती है।
शुरूआती वर्षों में इस बाग के साथ लगा सकते हैं।
फसलें ज्यादा आमदन देती हैं और ज़मीन में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाती हैं।
खरपतवार रोकथाम
बेर की खेती या बागवानी में अगस्त महीने के पहले पखवाड़े की शुरूआत में 1.2 किलोग्राम डयूरॉन खरपतवारनाशी प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।
खरपतवारनाशी का प्रयोग खरपतवार के पैदा होने से पहले करना चाहिए।
खरपतवार के पैदा हो जाने की सूरत में जब यह 15 से 20 सैंटीमीटर तक लंबे हो जायें तो इनकी रोकथाम के लिए 1.2 लीटर गलाईफोसेट या 1.2 लीटर पैराकुएट का प्रति 200 लीटर पानी में घोल तैयार करके प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।
खरपतवारनाशी का छिड़काव बेर पौधों को बचाकर करें या फिर निराई गुड़ाई द्वारा भी बेर के खेत को खरपतवार मुक्त रख सकते है।
पौध संरक्षण
बेर में लगने वाले प्रमुख कीट एवं रोग का वर्णन निम्न है। जिसका निदान आवश्यक है।
कीट एवं उनका नियंत्रण
फल की मक्खी
यह बेर का सबसे बड़ा हानिकारक कीट है। जब फल छोटे व हरे रहते हैं तब इस कीट का आक्रमण शुरू होता है।
शुरू में फल में एक लट (मेगट) पाई जाती है।
छोटे फल इसके प्रभाव में काणे हो जाते हैं लेकिन बड़े फलों के आकार में कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता है।
आक्रमण से बीज के चारों ओर एक खाली स्थान हो जाता है। तथा लटें अंदर से पूरा फल खाने के बाद बाहर आ जाती है।
बाद यह मिट्टी में प्यूपा के रूप में छिपा रहता है।
कुछ दिन बाद इससे मक्खियां बनकर तैयार हो जाती हैं तथा इनका आक्रमण फलों पर पुनः शुरू हो जाता है।
सुंडी की अवस्था में फल के अंदर रहता है। तथा गूदे को खाता है।
प्रभावित फल समानरूप से नहीं बढ़ते तथा देखने में बेडौल दिखाई देते हैं।
फल मक्खी कच्चे फलो के उपरी सतह से निचे अंडे देती है। जिससे 23 दिन में सुंडी निक आती है। जो कि बेर कि गुदे को खाती है।
नियंत्रण –
फल मक्खी के प्रति अवरोधक किस्मे जैसे कैथा, सनौर नंबर -1, मेहरून व दुधिया किस्मे लगना चाहिए
ग्रसित फलो को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए और नीम का काढ़ा या गौ मूत्र का छिड़काव चाहिए करना .
रोकथाम के लिए नवम्बर से आरम्भ में जब फल लग जाए (मटर के आकार के हों) तब पौधों पर 1500 मिली.मेटासिस्ट्रोक्स 30 ई.सी. या 12.50 मिली. रोगार को 1250 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जाता है।
मात्रा एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त है। गर्मियों में बाग़ की जुताई भी इसके प्रकोप को कम करने में सहायक है।
छाल खाने वाली सुंडी
यह किट तने पर या शाखाओ के कोण पर छिद्र करके नुकसान करते है। छिद्र के बाहर इस किट का बिट दिखाई देती है।
दिन के समय यह किट निष्क्रिय रहता है। रात के समय अधिक क्षति करता है।
नियंत्रण –
इस कीड़े की रोकथाम के लिए प्रति रोधी किस्मे किस्मो का रोपण करना चाहिए
देसी अलबार , इलायची कैथली आदि. इस कीड़े की रोकथाम के लिए पहले वृक्ष पर पाये जाने वाले सुरंगों का पता लगाया जाता है।
सुरंग के आसपास मल द्वारा तैयार जाला को साफ़ करके सितम्बर-अक्टूबर के महीने में
10 मिली. मेटासिड 50 ई.सी. को 10 लीटर पानी में घोलकर सुरंग में डाले तथा सुरंग को मिट्टी से बंद कर दें।
यही उपचार दुबारा फरवरी-मार्च में दुहरायें।
उपचार के स्थान पर 10 प्रतिशत मिट्टी का तेल (1 लीटर मिट्टी का तेल + 9 लीटर पानी + 100 ग्राम साबुन का घोल) भी प्रभावकारी पाया गया है।
बेर का बीटल
इसके प्रौढ़ कीड़े की लम्बाई 12-15 मि.मी. तक, रंग हल्का भूरा होता है। यह पत्तियों को खाती है।
तथा भयंकर प्रकोप की दशा में पेड़ पर पत्तियाँ नाममात्र की बचती है। परिणामस्वरूप उत्पादन बहुत घट जाता है।
नियंत्रण –
इस किट के नियंत्रण के लिए गो मूत्र या नीम का काढ़ा का छिड़काव करे . कीट- बेर की खेती में लगने वाले मुख्य कीट फल बेधक और फल मक्खी है।
फल बेधक की रोकथाम के लिए 3 से 4 मिलीलीटर क्लोरोफायरिफोस प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें,
छिड़काव के एक सप्ताह तक फल नहीं तोड़ने चाहिए।
लाख कीट
कीट शाखाओं का रस चूसते हैं। जिससे धीरे-धीरे शाखायें सूख जाती है।
प्रभावित शाखाओं को काटकर जला देते हैं।
पूर्ण नियंत्रण के लिए 0.1 प्रतिशत रोगार का छिड़काव उपयोगी है।
रोग एवं उनका नियंत्रण
चूर्णी फफूंद
बहुत ही घातक रोग है। ओडियम स्पिसिज द्वारा फैलता है।रोग का प्रकोप अक्टूबर-नवम्बर में शुरू होता है।
रोग से फसल को काफी हानि पहुंचाती है।
चूर्णी फफूंद रोग के प्रकोप से पत्तियों व फलों की सतह पर सफेद पाउडर की परत दिखाई देती है।
जिससे फलों का विकास रुक जाता है।
ber fruit फल देखने में गंदा दिखाई पड़ता है। भयंकर प्रकोप की दशा में फल झड़ने भी लगते हैं।
नियंत्रण
रोग के नियंत्रण के लिए जुलाई से दिसंबर तक प्रत्येक माह या 15 दिन में नीम का काढ़ा या गौ मूत्र का छिड़काव करना चाहिये
चूर्णी फफूंद बीमारी के शुरुआत होते ही केराथेन 0.1 प्रतिशत या 0.2 प्रतिशत सल्फेक्स के घोल का छिड़काव पौधों पर करें।
पन्द्रह दिन के अंतर पर यही छिड़काव दुहरायें।
पत्तियों के काले धब्बों वाला रोग
पत्तियों के काले रोग आइसरियाप्सिस नामक फफूंद से होता है। इसकी शुरुआत सितम्बर-अक्टूबर में होती है।
पत्तियों के काले रोग से पत्तियों के निचली सतह पर गहरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं
कभी-कभी पत्ती की निचली सतह काली दिखाई पड़ती है।
नियंत्रण
पत्तियों के काले रोग के नियंत्रण के लिए नीम का काढ़ा या गौ मूत्र का छिड़काव करना चाहिए
रोग के निदान के लिए पौधों पर 0.3 प्रतिशत कॉपर आक्सीक्लोराइड नामक कवकनाशी का छिड़काव उपयोगी है।
फल सडन रोग
यह रोग कई प्रकार के फफूंदी जैसे अल्टरनेलिया स्पीशीज, फोमास्पीशीज, पेस्टालोशिया स्पीशीज आदि से फैलती है।
फल ber fruit सडन रोग के प्रकोप से फल के निचले हिस्से पर हल्के भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते है।
जो धीरे-धीरे पूरे फल पर दिखाई देने लगता है।
धब्बों के ऊपर छोटे-छोटे काले धब्बे भी दिखाई देते है।
कभी-कभी इन धब्बों पर गहरे भूरे रंग के छल्ले भी दिखाई देते हैं।
नियंत्रण
ber fruit फल सडन रोग के नियंत्रण के लिए 0.2 प्रतिशत ब्लाइटौक्स कवकनाशी का छिड़काव रोग के लक्षण दिखाई देते ही करना लाभदायक है।
तुड़ाई :-
पौधे पर सभी फल एक समय पककर नहीं तैयार होते।
अत: तुड़ाई 4-5 बार में की जाती है। फल जनवरी से अप्रैल तक चलते है।
फलो का पूर्ण पारी पक्व अवस्था में ही तोड़ना चाहिए कच्चे अत्यअधिक पके फल देने से स्वाद कि दृष्टी से ख़राब होते है।
मिठास और खटास का उचित समिश्रण केवल उचित रूप से पके फलो में ही मिलता है।
अधिकांस किस्मो में हरे फल सुनहले पीले होने पर तुड़ाई करनी चाहिए
अधिक पकने पर फलो का रंग भूरा लाल हो जाता है।
ber fruit अधपके फलों का बाजार भाव ठीक नहीं मिलता।
अवस्था में फलों की भंडारण क्षमता भी कम होती है।
अत: फलों की तुड़ाई सही समय पर करना आवश्यक है।
तुड़ाई हाथ द्वारा की जाती है।
डंडे आदि का उपयोग करने पर फलों को चोट पहुंचती है।
साथ ही फल को अच्छी दशा में लम्बे समय तक बनाये रखने के लिए फलों की तुड़ाई सुबह या शाम के समय करनी चाहिए।
तुड़ाई उपरांत अच्छे बाजार भाव व लम्बे समय तक भंडारण के लिये फलों का वर्गीकरण आवश्यक है।
अत: तुड़ाई के समय किस्म के अनुसार ल अलग-अलग रखा जाता है।
इसके बाद फलों को उसके रंग व आकार के अनुसार छंटाई की जाती है।
छंटाई उपरांत फलों को बांस की टोकरियों या लकड़ी या गत्ते के डिब्बों में बाजार भेजा जाता है।
उपज:
लगभग 4 या 5 वर्षो में पौधा फल देने लगता है। बेर ber fruit की खेती से उपज जलवायु, किस्म और बाग के रखरखाव के आधार पर प्राप्त होती है।
लेकिन उपरोक्त विधि से खेती करने पर 9 से 10 वर्ष आयु वाले बेर की कलमी पौधे से औसत उपज 100 से 200 किलोग्राम फल प्रति पौधे से प्राप्त होती है।
और असिंचित दशाओ में उपज 50 से 120 किलोग्राम प्रति पौधा उपज मिलती है।
भंडारण
भंडारण बेर की किस्म तथा भंडारण दशा पर निर्भर करती है।
पके ber fruit फल कमरे के तापमान पर लगभग एक सप्ताह तक तथा शीत भंडारण में (40 सें.) पर एक माह तक अच्छी दशा में रखे जा सकते हैं।

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